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शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

कांग्रेस का असली चेहरा

 आज देश में मुसलमानों की हेसियत क्या है ये बात किसी से छुपी नही है कल तक देश पर हुकूमत करके समानता का सन्देश देने वाला मुस्लमान आज बहुत ही कमज़ोर, लाचार और इस मुस्लमान को सिर्फ आज अपने बच्चो के भूके पेट की फ़िक्र हे वो भूल चूका है की उसी ने देश को आजाद कराया था उसी ने अपने बच्चो के कटे सर देखे थे उसी को फिरंगियो ने उसके मुल्क से दूर जेल में डाला था ये वही मुसलमान है जिसने बटवारे के वक्त जिन्ना को नकार कर हिंद की मिटटी को अपनी आँखों से लगाया था लेकिन आज ये मुस्लमान एक गुलाम से जादा हेसियत नही रखता इसकी क़ुरबानी को भुला कर इसकी बेटियों को हेवानो की तरह अपनी हवास का शिकार बनाया जाता है दंगो षड्यंत्र के ज़रिये इसकी मिलकियत को जलाया जाता है सरकार ख़ामोशी से तमाशा देखती है इस ज़ुल्म सहते हुए बेबस मुस्लमान को  आज देश में मुसलमानों की कमज़ोर हेसियत और पिछड़े पण का कोई ज़िम्मेदार हे तो सिर्फ कांग्रेस हे कांग्रेस ने मुसलमानों को अपना बताकर उनकी पीठ में चुरा मारा हे और ये सिलसिला अब तक जारी हे आजादी के बाद मुसलमानों ने अपने रहनुमा के तोर पर कांग्रेस को चुना और कांग्रेस जो तब से आज तक RSS जेसे देशविरोधियो के साथ मिल कर मुसलमानों का आर्थिक और सामाजिक दमन करती रही हे हिंदुस्तान की निजामत चलने वाले मुस्लमान आज बुखे हे और दो रोटी की तलाश में जुटे हुए हे और रोटी की ये तलाश मुसलमानों को सियासी हेसियत से दूर ले जा चुकी हे इस सभी की ज़िम्मेदार मुसलमानों से दिली नफरत और उपरी प्यार का दिखावा करने वाली कांग्रेस हे 

राजीव गांधी ने मुसलमानों को खुश करनी की कोशिश की राजीव गांधी के मुसलमानों को खुश करने के इस प्रयास से RSS के देशविरोधी हिन्दू नाराज़ हो गये और फिर राजनीति चाल चलते हुए राजीव गांधी ने नाराज हिंदू वोटरों को रिझाने के लिए अयोध्या के विवादित परिसर में शिलान्यास करा दिया और हिंदुत्व के कट्टर चेहरे के आगे सर जुका दिया गौरतलब है कि बाबरी मस्जिद के ताले खोलने और भगवान राम को मुक्त कराने और एक भव्य मंदिर के निर्माण के लिए 1984 में विश्व हिंदू परिषद ने एक अभियान छेड़ रखा था.

केंद्र और राज्य सरकारों के दबाव में (दोनों जगह कांग्रेस सत्ता में थी) फैजाबाद डिस्ट्रिक्ट जज ने एक फरवरी 1986 को विवादित परिसर में पूजा करने की अनुमति दे दी. प्रधानमंत्री के सलाहकारों ने हिंदू वोट खींचने की गरज से यह सलाह दी थी. और इस देशविरोधी और राजनीति से प्रेरित फैसले ने देश को नफरत की आंधी में झोक दिया जिसका नुकसान आज देश उठा रहा हे और इसी गलती की वजह से भाजपा जेसी नफरत सिखाने वाली देशविरोधी पार्टी का उदय हुआ जिसने देश को बाटने की भरसक कोशिश की और हिन्दू और मुसलमानों के bich नफरत की ऊँची दीवार खीचने के लिए देशद्रोहिं अडवानी ने रथ यात्रा निकाल कर देश को हिंसा में झोक दिया और नफरत के इसी रथ पर चढ़ कर भाजपा को सत्ता मिली कांग्रेस की गलती ने देश को अशांति में धकेल दिया और आज तक देशविरोधी ताकते हिन्दू मुसलमानों को बाटने का काम कर रही हे 

देश के हिन्दू और मुसलमानों के बिच आज भाजपा अपने राजनितिक लाभ के लिए जो नफरत और हिंसा फैला रही हे उसकी ज़िम्मेदार कांग्रेस हे 1992 में बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ और देश का सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ा और हिन्दू मुसलमानों के बिच न ख़तम होने वाली खायी बन गयी इस नफरत की असली ज़िम्मेदार कांग्रेस ही हे जिसने हिन्दुओ को लुभाने के लिए एक धार्मिक मुद्दे को जन्म देकर राष्ट्विरोधी भाजपा का जन्म करवाया
अंततः कांग्रेस के लिए यह एक बड़ी भूल साबित हुई.

अगर हम हाल की बड़ी राजनीतिक भूलों का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि कांग्रेस ने ही कुछ ऐसे अपरिपक्व फैसले लिए हैं जो आगे चलकर देश के लिए बहुत नुकसानदेह साबित हुए.

भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के लिए कंधार और कारगिल भयानक भूलें साबित हुईं जिससे देश को काफी नुकसान हुआ

.अपने राजनितिक हित के लिए इन राजनीतक पार्टियों ने देश को जो नुकसान पहुचाया उसकी भरपाई करना मुमकिन नही हे और आजादी के ६३ साल में जो कुछ मुसलमानों ने खोया उसकी पूर्ति हो ही नही सकती कांग्रेस ने आज तक मुसलमानों को अपना राजनितिक मोहरा बना रखा हे और इसका बहाना बनाने के लिए उसके पास भाजपा जेसी कट्टर राजनितिक पार्टी हे जिसका खोफ दिखाकर हमेशा कांग्रेस मुस्लिम वोटो को भाजपा से dra कर अपनी झोली में दाल लेती हे लेकिन अगर कांग्रेस बाबरी मस्जिद मुद्दे जो की मिलकियत का मुद्दा था राजनितिक न बनती तो भाजपा का जन्म
न होता और देश सम्पर्दयिकता से बहार निकल कर विकास के रास्ते पर चलता और देश हमेशा अमन की देवी बना रहता..

सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

गुजरात दंगा पूर्व नियोजित था: जस्टिस काटजू

 जस्टिस काटजू साहब ने गुजरात दंगो को पूर्वनियोजित बताते हुए नरेंद्र मोदी को पूरी  तरह जिम्मेदार बताया है माननीय काटजू जी ने  कहा :-कि गोधरा में दर असल क्या हुआ था, अभी भी ये एक रहस्य बना हुआ है. गोधरा कांड के बाद मुसलमानों को निशाना बनाने और हज़ारों लोगों को जान से मारने और उनके घर लूटने की कार्रवाई की हिटलर के नाज़ी जर्मनी से तुलना करते हुए जस्टिस काटजू ने लिखा था कि गुजरात दंगा पूर्व नियोजित था. उन्होने ये भी लिखा था कि वे इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं कि 2002 के गुजरात दंगों में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का कोई हाथ नहीं था. उन्होंने मोदी के विकास के दावों को भी ख़ारिज करते हुए लिखा था कि गुजरात में 48 फ़ीसदी बच्चे कुपोषित हैं और शिशु मृत्यु दर बहुत अधिक है. उन्होंन अंत में भारतीयों से अपील की थी कि वो अपने वोट डालते समय इस चीज़ों का ख़्याल रखें नहीं तो वे भी वहीं ग़लती करेंगे जो 1933 के चुनाव में जर्मनी की जनता ने की थी. उनका इशारा हिटलर के चुने जाने की तरफ़ था. 
साम्प्रदायिकता के बल आर सत्ता हथियाने की साजिशे रचने वाली भाजपा ने जस्टिस काटजू साहब को कांग्रेस का एजेंट खा है लेकिन जस्टिस काटजू साहब ने फ़ौरन पलटवार करते हुए भाजपा को याद दिलाया कि उन्होंने फ़ेसबुक पर कुछ लिखने के लिए महाराष्ट्र में दो लड़कियों की गिरफ़्तारी पर महाराष्ट्र सरकार की कड़ी आलोचना की थी जो कि कांग्रेस शासित राज्य है. काटजू ने कहा कि अफ़ज़ल गुरू की फांसी के बाद दिल्ली के पत्रकार इफ़्तिख़ार गिलानी के साथ पुलिस के दुर्व्यवहार पर भी उन्होंने फ़ौरन कार्रवाई करते हुए इसके लिए ज़िम्मेदार पुलिस वाल के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करने की मांग की थी
जस्टिस काटजू साहब का ये बयान देश की एकता अखंडता और भाईचारे का प्रतीक है हम उरी तरह जस्टिस काटजू साहब का समर्थन करते हुए आ लोगो से भी उनके पक्ष में खड़े होने की गुज़ारिश करते है 

इंकलाब जिंदाबाद 

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

गुजरात चुनाव: नतीजे थे या साजिश


 2002 esa lkcefr ,Dlizsl esa ,Q&6 cksxh dks lqfu;ksftr rjds ls tyok fn;k x;kA ftlesa dkj lsodksa dh ekSr gqbZ vkSj bl vekuoh; ?kVuk ds lkFk gh xqtjkr jkT; dk lEiznkf;dj.k gks x;k vkSj ,d cM+s iSekus ij jkT; esa eqlyekuksa dk ujlagkj djok;k x;k eqfLye yM+fd;ksa ds lkFk 20&20 yksxksa us cykRdkj ljs vke cykRdkj fd;k ek¡ ds isV dks phj dj cPpksa dks iSnk gksus ls igys gh ftank tyk fn;k x;k vkSj ujlagkj iz’kklu ds yksxksa [kqn bl ujlagkj dk usr`Ro fd;k bldk mnkgj.k tsy esa can Hkktik dh usrk ek;k dksMukuh] ckcw ctjaxh bR;kfn dks ekuk tk ldrk gSA jkT; esa gq, bl ujlagkj ds [kqys vkjksi ujsUnz eksnh ij yxrs jgs vkSj 2002 ujlagkj ds ckn gq, pqukoh esa xqtjkr dh lkEiznkf;d turk us ujsUnz eksnh dks vius ghjks ds :i esa pquk] ysfdu 2012 vkrs vkus xqtjkr dh pqukoh fQtk cny pqdh FkhA [kqn eksnh ds lhfu;j jgs Hkktik ds usrk o xqtjkr ds iwoZ eq[;ea=h ds’kwHkkbZ iVsy eksnh ds oksVkas esa ls/k yxk pqds FksA ds’kwHkkbZ iVsy viuh ubZ jktuhfrd ikVhZ ds lkFk eSnku esa Fks vkSj Hkktik ds ,d vU; usrk ds leFkZu esa eksnh ds fo:) iksLVj yxkus Hkktik ds gh yksx fn[kkbZ fn, eksnh ds fo:) eksnh ds gh lkFkh eksnh ds oksVksa dk cUVk/kkj dj jgs Fks vkSj pquko urhtks esa Hkktik ds 7 ea=h क्रषि मंत्री दिलीप सघानी, स्वास्थ मंत्री जय नारायण व्यास, सामाजिक और न्याय अधिकारिता मंत्री फ़क़ीर भाई वाघेला, वन राज्य मंत्री किरीट सिंह राना, क्रषि राज्य मंत्री कानू भाई भलाला, गृह मंत्री प्रफुल पटेल, शिक्षा मंत्री जय सिंह चौहान  Hkh ijkftr gq, ftlls lkfcr gksrk gS fd Hkktik dk fdyk dj dj dkaxzsl eksnh dks gh eq[;ea=h बukuk pkgrh FkhA otg Hkh lkQ gS eksnh dh thr eksnh ds dn dks Hkktik esa cM+k djrk gS vkSj igys ls Hkktik dh vkSj ls iz/kkuea=h in ds nkosnkjksa esa vkus okyk eksnh dk uek vkSj etcwr gksrk gS eksnh ds bl c<+rs dn dk lh/kk ykHk dkaxzsl dks feysxk D;ksafd vxj eksnh iz/kkuea=h in d mEehnokj curk gS rks ns’k Hkj ds lsD;wyj vkSj vYila[;d eksnh iz/kkuea=h u cu tk, bl Mj ls dkaxzsl nwljh ikfVZ;ksa dh rjQ :[k dj jgs eqfLyeksa dks fQj oksV cSad cukus esa lQy gksxhA दिल्ली की कांग्रेसी मुख्यामंत्री शीला दीक्षित ने गुजरात चुनाव नतीजो के बाद कहा था इस बात में कोई संदेह नही है की गुजरात का विकास हो रहा है इसलिए सरकार फिर से चुनी जा रही है इससे पहले भी एक गुजरात का कांग्रेसी नेता विजय दर्डा ने कहा था कि मोदी गुजरात का शेर और राष्ट्रीय संत है इसका सीधा अर्थ है कि कांग्रेस को मोदी से कोई शिकवा नही है और वो चाहती है कि भज मोदी को ही प्रधानमंत्री पद के लिए नामित करे ताकि कांग्रेस मुसलमानों को मोदी से डरा कर उन्हें आना वोट बैंक बनाये रखे 
इन्कलाब जिंदाबाद 

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

भगवा आतंकवाद: सिर्फ बयानबाज़ी क्यों


 भगवा आतंवाद पर सरकार के लोग सिर्फ बयानबाज़ी करते रहे है जबकि इन आतंकवादियों पर करवाई होनी चाहिए और इनके संगठनो को फ़ौरन बेन किया जाना चाहिए
देश में हुए 4 धमाकों में संघ से जुड़े एक बड़े चेहरे का नाम आया था। ये नाम था संघ की प्रचारक समिति के सदस्य इंद्रेश कुमार का। NIA ने बाकायदा अपनी चार्जशीट में इंद्रेश कुमार को आरोपी बताया था।
भारत की सरजमीं पर चार भयानक धमाके हुए पहला (18 फरवरी 2007) को समझौता एक्सप्रेस में, दूसरा (18 मई 2007) को हैदराबाद की मक्का मस्जिद में, (तीसरा 11 अक्टूबर 2007) को अजमेर दरगाह में और चौथा (29 सितंबर 2008) को मालेगांव में। इन चार धमाकों में कुल 94 लोग मारे गए। एजेंसियों ने जांच शुरू की तो कई गिरफ्तारियों के बाद एक नाम सामने आया, ये नाम था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की प्रतिनिधि सभा के सदस्य इंद्रेश कुमार का। साल 2011 में दाखिल अपनी चार्जशीट में NIA ने बाकायदा इंद्रेश कुमार का नाम लिया था। NIA ने आरोप लगाया था कि देश में हुए 4 धमाकों की साजिश को अमली जामा पहनाने का काम इंद्रेश कुमार ने ही किया था। NIA ने कहा था कि इंद्रेश कुमार ने इन धमाकों को अंजाम देने के लिए पैसे मुहैया कराए और लोगों को उकसाया। यानि एनआईए की चार्जशीट में इंद्रेश कुमार का नाम आतंक के चेहरे के तौर पर उभरा। संघ के इतने बड़े और अहम चेहरे को आतंकवादी साजिशों का कर्ताधर्ता बताया गया ?
दरअसल NIA के हाथ इंद्रेश कुमार के खिलाफ कई अहम सबूत मिले थे। टेलीफोन पर हुई बातचीत और कई दस्तावेजों के अलावा NIA ने अजमेर धमाके में गिरफ्तार स्वामी असीमानंद से पूछताछ के आधार पर साल 2005 में हुई दो अहम बैठकों का भी हवाला दिया था। इसमें से एक बैठक गुजरात में हुई थी जिसमें इंद्रेश के साथ असीमानंद खुद मौजूद था। दूसरी बैठक राजस्थान में हुई थी जिसमें अलग-अलग लोगों को धमाके की जिम्मेदारी सौंपी गई। राजस्थान की बैठक में इंद्रेश कुमार के साथ साध्वी प्रज्ञा सिंह भी मौजूद थीं।
वही प्रज्ञा सिंह जो पिछले चार साल से इन धमाकों में जेल की सलाखों के पीछे हैं। यहां ये भी ध्यान देने वाली बात है कि साध्वी प्रज्ञा सिंह भी बीजेपी की छात्र इकाई ABVP की सदस्य थीं। कैंसर से पीड़ित होने के बाद साध्वी लगातार जमानत की कोशिश कर रही हैं। कांग्रेस का ये भी आरोप है कि साध्वी प्रज्ञा केस को लेकर बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज प्रधानमंत्री से भी मिल चुके हैं। गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे के बयान पर सियासत भले हो रही हो। लेकिन एक सच्चाई ये भी है कि संघ से जुड़ा एक बड़ा चेहरा आतंक के आरोप में कठघरे में है। अदालत में केस भी चल रहा है। ऐसे में शिंदे का ये बयान अंधेरे में मारा गया तीर नहीं कहा जा सकता।
 महाराष्ट्र में सक्रिय अतिवादी हिन्दू संगठन की कार्रवाइयों के बारे में राज्य की गुप्तचर सेवा ने एक क्लासिफाइड रिपोर्ट महाराष्ट्र सरकार को पेश की है। (DNA- Hardcore Hindu Body Behind Nanded Blast, Dharmendra Tiwari. Sunday, June 11, 2006 20:1 IST)  इस रिपोर्ट में महाराष्ट्र में पहली दफा सामने आये आतंकवादी हिन्दू संगठन की कारगुज़ारियों पर रोशनी डाली गयी है और उस पर नकेल डालने के लिए विशेष कदम उठाने की सलाह दी है। यूं तो इन हिन्दू अतिवादी संगठनों की बमगोलों एवम बन्दूकों की कार्रवाइयों के बारे में सरकार को अपने विश्वस्त सूत्रों से पहले से ही सूचनायें मिल रही थीं, यहां तक कि विगत दो-तीन साल में नान्देड तथा उसके इर्दगिर्द के ज़िलों - औरंगाबाद, परभणी - आदि स्थानों पर हुए बम विस्फोटों में उनके हाथ होने के सूत्र मिल रहे थे, लेकिन यह पहली दफा हुआ कि किसी बड़ी हिंसक कार्रवाई को अंजाम देने के पहले ही वह पुलिस की पकड़ में आये। छह अप्रैल को महाराष्ट्र के चर्चित शहर नान्देड में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पुराने कार्यकर्ता लक्ष्मण राजकोंडवार के घर हुई बम विस्फोट की घटना से सभी राज़ एक-एक कर खुलते गये। सिंचाई विभाग का यह रिटायर्ड इंजीनियर राजकांेडवार खुद उन दिनों किसी धार्मिक यात्रा पर गया हुआ था। उस रात सिंचाई विभाग कर्मचारियों की कालोनी पाटबन्धारे नगर में रिटायर्ड इंजीनियर राजकोण्डवार के घर में हुए रहस्यमय बम विस्फोटों में दो लोगों की नरेश राजकोण्डवार (रिटायर्ड इंजीनियर के पुत्र) और- हिमांशु पानसे की ठौर मौत हुई थी और बाकी तीन - योगेश देशपाण्डे, मारूति वाघ और गुरुराज तुपत्तेवार - (या चार) गम्भीर रूप से घायल हुए थे। घायल हुए व्यक्तियों ने होश में आने पर पुलिस को बताया था कि उनके साथ एक चौथा व्यक्ति राहुल भी था, जो तुरन्त वहां से भाग निकला था, जिसे पुलिस ने बाद में हिरासत में लिया। पुलिस के मुताबिक यह सभी लोग संघ परिवार के आनुशंगिक संगठन बजरंग दल के पुराने कार्यकर्ता थे, जिनमें से कुछ उसके पदाधिकारी भी रह चुके थे, और बजरंग दल की बैठकों में जाया करते थे। इस मामले की शुरुआती जांच स्थानीय पुलिस ने की और बाद में इस मामले को आतंकवाद विरोधी दस्ते (एण्टी टेरअरइज़्म स्क्वाड) को सौंपा गया ।
जानने योग्य है कि महाराष्ट्र में जिहादी आतंकवादी संगठनों के समानान्तर अतिवादी हिन्दू संगठनों के बढ़ते खतरे के बारे में जनाब आर आर पाटील ने, जो महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री है तथा गृह विभाग सम्भालते हैं, अपने प्रेस सम्मेलन में लोगों को बताया था। नागपुर स्थित संघ कार्यालय पर हुए आतंकी हमले के बाद उन्होंने यह जानकारी दी थी। पीटीआई द्वारा जारी समाचार के मुताबिक :
...उपमुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि पुलिस ने कुछ महीने पहले हुए नान्देड बम विस्फोटों के बारे में जो सुराग हासिल किये हैं वे इसी साल के शुरुआत में हुए परभणी बम विस्फोटों से जुड़ते हैं। पाटील का कहना था इस सम्भावना को खारिज नहीं किया जा सकता कि दोनों विस्फोटों के पीछे हिन्दू अतिवादी संगठनों का हाथ हो। (DNA, PTI Thursday June 01, 2006 17:35 IST)
अगर मराठी अख़बार ‘लोकमत’ ( 24 मई 2006) की औरंगाबाद के हवाले से दी गयी ख़बर पर नज़र डालें तो यह स्पष्ट होता है कि मंत्री महोदय अपनी बातों के बारे में गंभीर थे। रिपोर्ट के मुताबिक
‘पुलिस कमिश्नर उद्धव काम्बले ने मीडिया को बताया कि बजरंग दल कार्यकर्ताओं द्वारा सम्पन्न नान्देड बम विस्फोट और औरंगाबाद में वर्ष 2001 और 2002 में हुए बम विस्फोटों के अन्तर्सम्बन्ध दिखाई देता है।
...18 मई 2001 को औरंगाबाद के गणेश मन्दिर के पास एक बम विस्फोट हुआ था। जब इस केस की तहकीकात चल रही थी तब 17 नवम्बर 2002 को विश्व हिन्दू परिषद के निराला बाज़ार स्थित कार्यालय के पास एक बम विस्फोट हुआ, उसके बाद खडकेश्वर के पास बने महादेव मन्दिर में एक बम विस्फोट हुआ। निराला बाजार और खडकेश्वर बम विस्फोटों में पाइप बमों का प्रयोग किया गया था। यह बात रेखांकित की जानी चाहिये कि एक महीना पहले सामने आये नान्देड बम विस्फोटों में भी पाइप बमों का प्रयोग किया गया था। यह बात भी सामने आयी थी कि बजरंग दल के कार्यकर्ता बम बना रहे थे।
नान्देड बम विस्फोट और औरंगाबाद में हुए दो बम विस्फोटों की समानताओं को देखते हुए इनकी जांच चल रही है।...( मराठी से अनूदित- लेखक)
अगर नान्देड बम विस्फोट के प्रसंग पर विधिवत नज़र दौड़ायी जाये तो पता चलता है कि हिन्दुत्व ब्रिगेड के कारिन्दों ने किस तरह की आपराधिक साज़िश रची थी जो सफल नहीं हो सकी। गौरतलब है कि पूर्व उप प्रधानमंत्री आडवाणी की ‘भारत सुरक्षा यात्रा’ के महाराष्ट्र आगमन के ऐन मौके पर, जिसने काफ़ी पहले से ही लोगों के मन में इसके पहले की सोमनाथ से अयोध्या की रथयात्रा की रक्तरंजित यादें तेज़ की थीं, इस साज़िश का खुलासा हुआ था। समस्या कई कारणों से इसलिए बढ़ गयी थी कि वह अप्रैल का महीना था जिसमें कई सारे त्यौहार एक साथ उपस्थित थे : मसलन महावीर जयंती, बाबासाहब अम्बेडकर जन्मदिवस और हनुमान जयंती। इसके अलावा विस्फोट के पहले चन्द दिनों से शहर का माहौल भी तनावपूर्ण था। किसी सिख युवती के किसी मुस्लिम युवक के साथ चले विवाह प्रसंग और उसके बाद घर से पलायन ने दोनों समुदायों को आमने सामने ला खड़ा किया था। पुलिस ने जब बाद में बम विस्फोट में मारे गये हिमांशु के घर पर छापा मारा तब वहां उन्हें इलाके में आमतौर पर मुसलमानों द्वारा पहने जाने वाले पहनावे, टोपियां, अलग-अलग आकारों की दाढ़ी भी मिली। आसपास के ज़िलों में बनी मस्ज़िदों के नक्शे भी वहां से बरामद हुए थे। कोई साधारण व्यक्ति भी बता सकता है कि पहले से साम्प्रदायिक तौर पर संवेदनशील कहे गये नांदेड और आसपास के इलाके में दंगों के आयोजन की योजना थी।
कोलकाता से निकलने वाले दैनिक ‘द टेलिग्राफ’ ने (10 अप्रैल 2006) परिस्थिति का विश्लेषण करते हुए अपने रिपोर्ताज ‘बजरंग ब्लोज़ अपआन आडवाणी’ में लिखा था :
‘पुलिस ने इस बात की पुष्टि की है कि बजरंग दल के कार्यकर्ता पिछले सप्ताह महाराष्ट्र में हुए बम विस्फोट में शामिल थे जिसमें दो लोगों की मौत हुई। यह घटना लालकृष्ण आडवाणी के लिए परेशानी का सबब बन सकती है जिनकी यात्रा, जिसे ‘भारत सुरक्षा यात्रा’कहा गया है, आज राज्य में पहुंची क्योंकि बजरंग दल को संघ परिवार का हिस्सा माना जाता है।’
इस घटना की चर्चा करते हुए बम्बई से निकलने वाले अंग्रेज़ी दैनिक ‘मिड डे’ ( 9 अप्रैल 2006) ने स्पष्ट किया था कि जांच अधिकारी इस बात को लेकर स्पष्ट था कि मारे गये दो लोग हिमांशु पानसे और नरेश राजकोण्डवार (मकान मालिक का बेटा) ‘समय समय पर बजरंग दल के पदाधिकारी थे और उसकी बैठकों में शामिल होते थे।’
रिपोर्ट के मुताबिक :
‘गौरतलब है कि इसके अलावा पुलिस ने उपरोक्त स्थान से एक और बम बरामद किया है और उसे बेकार कर दिया है। बुधवार की सुबह भाग्यनगर पुलिस स्टेशन के अन्तर्गत आने वाले पाटबन्धारे नगर में सिंचाई विभाग के एक सेवानिवृत्त अधिकारी के घर यह विस्फोट हुआ था’
अगर हम नांदेड की सामाजिक संरचना पर गौर करें तो पता चलता है कि वहां हिन्दू (सात लाख), मुस्लिम (दो लाख) और सिख (1 लाख) सभी रहते हैं और विभिन्न कारणों से यह शहर साम्प्रदायिक तौर पर संवेदनशील माना जाता है।
अगर प्रस्तुत यात्रा के पहले तमाम गैरभाजपा दलों द्वारा इस यात्रा के प्रभावों को लेकर प्रगट की गयी चिन्ताओं को देखें तो नान्देड की घटनाओं का महत्व समझ में  आ सकेगा। इन सभी दलों ने एक सुर से मांग की थी कि यह यात्रा साम्प्रदायिक तनावों को बढ़ा सकती है, तनावों की नयी ज़मीन तैयार कर सकती है। इसे महज़ इत्तेफ़ाक़ नहीं कहा जा सकता कि यात्रा के शुरू होने के बाद अप्रैल माह में खण्डवा (मध्यप्रदेश), पाली (राजस्थान), भागलपुर (बिहार) आदि स्थानों पर साम्प्रदायिक दंगे हुए हैं। रांची ( झारखण्ड), वाराणसी (उत्तर प्रदेश) में भी तनाव की स्थिति बनती दिख रही थी लेकिन सामाजिक संगठनों के हस्तक्षेप एवम पुलिस की सूझबूझ से मामले को समय रहते ही शान्त किया जा सका।
निश्चित ही नांदेड में सामने आये बम विस्फोट के तथ्य एक साज़िश की ओर इशारा करते हैं, जिसके तहत एक पुराने हिन्दुत्ववादी कार्यकर्ता के घर पर बम बनाये जा रहे थे। आखिर वह साज़िश क्या थी ? क्या उसका ताल्लुक महज़ नांदेड तक सीमित था ?
हिन्दुत्व ब्रिगेड के ढांचे से परिचित लोग बता सकते हैं कि वह किस तरह ऊंच-नीच अनुक्रम/श्रेणीबद्धता/हाइरआर्की पर टिका रहता है और जब तक हिन्दुत्व ब्रिगेड के सुप्रीमो हरी झण्डी नहीं देते तब तक किसी भी काम को अंजाम नहीं दिया जा सकता। आखिर यह जानने की ज़रूरत है कि अगर बजरंग दल के कार्यकर्ता बम बना रहे थे, तो किसके इशारे पर बना रहे थे, योजना क्या थी ? लोगों को याद हो कि नान्देड ज़िला महाराष्ट्र के जिस मराठवाड़ा क्षेत्र में स्थित है, वहां पर शिवसेना से लेकर संघ परिवार की अन्य जमातों की अच्छी खासी पकड़ है। कुछ साल पहले इसी इलाके के परभणी तथा अन्य स्थानों पर मस्जिदों के आसपास बम विस्फोट हुए थे, जिसमंे न केवल कई निरपराध मारे गये थे बल्कि इसके बाद पूरे इलाके में साम्प्रदायिक तनाव भी फैला था। निश्चित ही राज्य सरकार को चाहिये कि अपनी जांच का दायरा महज उपरोक्त घटना विशेष तक सीमित न रखे बल्कि उसकी गहराई में जाये।
इसे गनीमत ही समझा जाना चाहिए कि आडवाणी की यात्रा के महाराष्ट्र पहुंचने के ऐन मौके पर बम बनाने के इस काण्ड का पर्दाफाश हो गया, अगर नहीं होता तो क्या परभणी की मस्जिदों के सामने हुए बम विस्फोटों की तरह विस्फोटों की एक नयी श्रंृखला सामने आती और वह पूरे सूबे में तनाव का सबब बनती ? नांदेड बम विस्फोटों की पड़ताल करने नागपुर शहर से गयी ‘पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज़’ एवम ‘सेक्युलर सिटिज़न्स फोरम’ की रिपोर्ट में इस बात का विशेष उल्लेख किया गया है कि भाजपा तथा शिवसेना के स्थानीय पदाधिकारियों ने ज़िला प्रशासन को इस बात की चेतावनी दी कि ‘बेगुनाहों को तंग न किया जाये’ जिसका अर्थ यही निकाला जा सकता है कि वह इस पूरे मामले की गहराई से जांच नहीं होने देना चाहते थे।

पिछले दिनों पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज़ (पी.यू.सी.एल), नागपुर तथा धर्मनिरपेक्ष नागरिक मंच, नागपुर के संयुक्त तत्वावधान में नांदेड बम विस्फोट को लेकर एक रिपोर्ट जारी की गयी (www.pucl.org) प्रस्तुत रिपोर्ट बजरंग दल के प्रांतीय अध्यक्ष के इन दावों को खारिज करती है कि विस्फोट वहां रखे गये पटाखों के कारण हुए। रिपोर्ट के मुताबिक ‘अगर पटाखे आग पकड़ते हैं तो इन विस्फोटों/आवाज़ों का एक सिलसिला सुनाई देता है, न कि कोई सशक्त विस्फोट दिखता है। दूसरे, पटाखे जलने की सूरत में मकान में भी आग लगती है, ऐसी बात यहां नहीं दिखती। 7 अप्रैल को जारी पोस्ट मार्टेम रिपोर्ट ‘पटाखों’ की बात को पूरी तरह खारिज करती है क्योंकि उसके मुताबिक मृतकों के शरीरों से बम के टुकड़े भी निकाले गये।’ रिपोर्ट इस बात को भी जोड़ती है कि ‘नांदेड के पुलिस महानिदेशक/आई.जी. ने इस बात की ताईद की है कि मौका-ए-वारदात से ज़िन्दा पाईप बम बरामद हुए तथा सभी आरोपी बजरंग दल से संबंधित थे। तथा उपरोक्त घर बम बनाने का कारखाना था।’ टीम के लिए सबसे अधिक चिन्ताजनक पहलू था कि बरामद किया गया ज़िन्दा बम आई. ई. डी. तरह का था जिसे रिमोट कन्ट्रोल से संचालित किया जा सकता था।

अभी दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि नांदेड बम विस्फोट की साजिश में पकड़े गये इन युवकों तथा असली साजिशकर्ताओं पर किस धारा में मुकदमा चलेगा। अगर आडवाणी के गृहमंत्री काल को याद करें तो उन दिनों बनाया एक कानून अगर अभी भी कायम होता तो निश्चित तौर पर इन सभी पर इसी कुख्यात पोटा के तहत आतंकवादी के तौर पर मुकदमा चलता। इसकी धारा तीन साफ-साफ कहती थी ‘जो कोई लोगों में आतंक फैलाने के उद्देश्य से ऐसा कोई काम करता है - जिसमें विस्फोटक पदार्थ या बन्दूक या अन्य किसी खतरनाक हथियार का प्रयोग होता है - या अन्य किसी भी तरीके से, जिसके तहत किसी व्यक्ति की जान चली जाती है या वह घायल होता है या सम्पत्ति का नुकसान होता है... वह आतंकवादी कारनामा करता है।’

वैसे यह तो स्पष्ट है कि यह कोई पहला मौका नहीं है जब हिन्दुत्ववादी संगठनों के कारिन्दे दंगा कराने की नीयत से आपराधिक कार्रवाइयों को अंजाम देते पकड़े गये हों। अभी पिछले साल की ही बात है भीलवाड़ा, राजस्थान में अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमलों के सन्दर्भ में क्षेत्रीय पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ को अपनी जांच पड़ताल में इसी किस्म के तथ्य सामने आये थे। अप्रैल माह की बात है, भीलवाड़ा के करेडा तहसील स्थित पांच मंदिरों में  786 लिखी हरी झंडियां और पशुओं की हड्डियां मिलीं। लगातार तीन दिन तक करेडा बन्द रहा। संघ सम्प्रदायी संगठनों ने करेडा स्थित सूफी दरवेश सैलानी सरकार पर इसकी ज़िम्मेदारी सौंपते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए उकसाया। पुलिस ने दबाव में आकर जांच भी की लेकिन उसे कुछ भी नहीं मिला। बाद में मंदिरों को अपवित्र करने की इस घटना में मुख्य सरगना कथित रूप से हिन्दुत्ववादी संगठन का एक नेता निकला

वैसे नान्देड बम विस्फोट में शामिल बताये जा रहे बजरंग दल के सदस्यों की गतिविधियों को हमेशा ही शंका की निगाहों से देखा जाता रहा है। जानकार लोग बता सकते हैं कि विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा 1986 में उसके गठन के समय से ही विवादों के साथ बजरंग दल का लम्बा रिश्ता रहा है। यही वह दौर था जब विश्व हिन्दू परिषद् की ओर से रामजन्मभूमि आन्दोलन को गति प्रदान करने के लिये राम-जानकी रथयात्रा का आयोजन किया जा रहा था और इसी यात्रा के लिये संरक्षण प्रदान करने के लिये हिन्दू युवकों को बजरंग दल के तत्वावधान में संगठित किया गया। विश्व हिन्दू परिषद् की स्थापना साठ के दशक के पूर्वार्द्ध में तत्कालीन संघ सुप्रीमो गोलवलकर की पहल पर हुई थी।

लोगों को याद होगा कि वर्ष 1999 में जब ग्राहम स्टेन्स और उसके दो छोटे बच्चों को जिन्दा जलाने की घटना में शामिल होने के भी इसके कार्यकर्ताओं पर आरोप लगे थे। इस घटना के महज़ तीन साल बाद उसी उड़ीसा में एक और बड़े काण्ड में विवादों के घेरे में आये थे। विश्व हिन्दू परिषद् और दुर्गा वाहिनी जैसे संगठन के सदस्यों के साथ मिलकर इनके सदस्यों द्वारा उड़ीसा विधानसभा पर किये गये हमले की ख़बर आयी थी। बताया जाता है कि इन संगठनों के सदस्य विधानसभा के बाहर धरने पर बैठे थे, जिसमें उनकी मांग थी कि अयोध्या में राम मन्दिर बनाने के लिये ज़मीन को रामजन्मभूमि न्यास को सौंपी जाये। जैसे ही सदन में भोजनावकाश हुआ, पांच सौ से अधिक की तादाद में त्रिशूल, लाठियां लिये इनके लोगों ने विधानसभा भवन पर हमला बोला। इस हमले में उन्होंने वहां काफ़ी तोड़फोड़ की और कई लोगों के साथ बदसलूकी की। (द हिन्दू, मार्च 17, 2002)

अभी दो साल पहले की ही बात है जब बजरंग दल और उसके ‘पितृ’ संगठन विश्व हिन्दू परिषद् ने महाराष्ट्र के सातारा ज़िले के प्रतापगढ़ किला स्थित अफ़ज़ल खान की कब्र को ध्वस्त करने का ऐलान किया था। (पीटीआई, सितम्बर 5, 2004) विश्व हिन्दू परिषद् और बजरंग दल के संयुक्त तत्वावधान में वहां इस काम को अंजाम देने के लिये काफ़ी लोगों को जुटाने की भी कोशिश की गयी थी। यह जुदा बात है कि यह समूचा कार्यक्रम टांय टांय फिस्स हो गया।

शायद लोगों को ढाई साल पहले उत्तर भारत के तमाम अख़बारों में छपी वह ख़बर याद होगी जिसमें बताया गया था कि ‘बजरंग दल ने किस तरह एक गांव को मुसलमानों से मुक्त किया।’ (इण्डियन एक्सप्रेस, 29 सितम्बर 2003) की रिपोर्ट ने इस घटनाक्रम का विस्तृत वर्णन पेश किया था : ‘अकलेरा (राजस्थान) एक चमकता केसरिया झण्डा इस ‘आदर्श हिन्दू ग्राम’ में आप का स्वागत करता है। हरियाली से घिरे मिश्रोली गांव ने इसी महिने यह नाम धारण किया है। बीते दस दिन यहां बजरंग दल के हथियारबन्द कार्यकर्ताओं ने उत्पात मचाया है, जिसके तहत उन्होंने 25 मुस्लिम परिवारों को अपने घरों से खदेड़ा है, उनके घरों में लूटपाट की है और उन्हें आग के हवाले किया है।’

पांच साल से अधिक समय बीत गया एक अन्य कारण से भी बजरंग दल और उसके समधर्मा संगठन चर्चित रहे हैं। अपने कार्यकर्ताओं को हथियारों का प्रशिक्षण देने के लिये वे शिविर चलाते रहते हैं। मुल्क के अलग अलग हिस्सों से इसके बारे में ख़बरें आती रहती हैं। नागरिक समाज/सिविल सोसायटी के सैन्यीकरण की उनकी कोशिशें -‘त्रिशूल दीक्षा’ जैसे एक अलग रूप में भी प्रगट होती रहती हैं जिसके तहत प्रतीकात्मक धार्मिक समारोह के ज़रिये लोगों को तेज़ धार वाले नुकीले हथियार बांटे जाते हैं। पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज ने 2003 की अपनी एक रपट में इस बात को उजागर किया था कि ‘त्रिशूल दीक्षा कार्यक्रमों और ऐसे इलाके जहां साम्प्रदायिक तनाव ने हिंसक शक्ल धारण की है, दोनों के बीच गहरा रिश्ता दिखता है।’

अब जहां तक अपने देश के संविधान का सवाल है तो उसके तहत यह स्पष्ट है कि निजी सेनाओं का हथियारबन्द होना एक तरह से कानून और व्यवस्था के लिए चुनौती समझा जाता है। 1959 में बना इण्डियन आर्म्स एक्ट बिना लायसेन्स के हथियारों के रखने पर पाबन्दी लगाता है। लेकिन इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि आज की तारीख में भारतीय नागरिक समाज के इस जबरन सैन्यीकरण को रोकने वाला कोई नहीं है।

कोई यह पूछ सकता है कि हिंसक घटनाओं में शामिल होने या एक ऐसा वातावरण बनाने के पीछे का तर्क क्या है ? इसमें कोई दो राय नहीं कि इस तरह की घटनायें जो सामाजिक ताने-बाने के साम्प्रदायिकीकरण तथा सैन्यीकरण को बढ़ावा देती हैं, उसके चलते जो वातावरण निर्मित होता है उसमें एक खास तरह के विचार को फलने-फूलने का अधिक मौका मिलता है तथा जनतांत्रिक विरोध की सम्भावनायें कम होती जाती हैं। संघ परिवार का विश्वदृष्टिकोण जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करता है, जो धार्मिक अल्पसंख्यकों को ही नहीं बल्कि अवर्ण हिन्दू जातियों को भी ‘अन्य’ की तरह देखता है, इसकी स्वीकार्यता बढ़ने की सम्भावनाएँ अधिक हो जाती हैं।

वैसे नांदेड में हुए बम विस्फोट तथा उसमें संलिप्त हिन्दुत्ववादी संगठनों के कारिन्दों की यह घटना लगभग 58 साल पुराने एक चर्चित वाकये की याद ताज़ा करती हैं जिसमें मुसलमानों के जनसंहार की योजना इन्हीं हिन्दुत्ववादी जमातों ने बनायी थी जिसमें उनके तत्कालीन सुप्रीमो का नाम भी उछला था। उन दिनों संयुक्त प्रांत के मुख्य सचिव रहे राजेश्वर दयाल के संस्मरण ‘ए लाईफ आफ अवर टाईम्स ( 1998, ओरिएन्ट लोंगमैन) में इस बात का विवरण पेश किया गया है। पुस्तक के मुताबिक बंटवारे के तत्काल बाद पश्चिम क्षेत्र के पुलिस महानिदेशक रहे जनाब जेटली ने उनके सामने हथियारों से लदे लोहे के दो बक्से पेश किये।‘ वे इस साज़िश का सुबूत थे कि पश्चिमी ज़िलों में साम्प्रदायिक विध्वंस के सिलसिले को बढ़ाया जाये। उसमें मुसलमानों की बस्तियों और रिहाइश के इलाके के अचूक नक्शे थे।... संघ के कार्यालयों पर समय रहते डाले गये छापों के चलते इस प्रचण्ड षडयंत्र का पता चल सका था। यह समूची साज़िश संगठन के सुप्रीमो के निर्देशों और देखरेख में ही चली थी।  मुख्य आरोपी गोलवलकर की तुरन्त गिरफ्तारी के आदेश देने के लिए ज़ोर डाला’ लेकिन संयुक्त प्रांत के तत्कालीन गृहमंत्री गोविन्द बल्लभ पन्त ने गिरफ्तारी का आदेश देने से इन्कार किया था

ibn7 & सुभाष गाताडे जी 





सोमवार, 19 नवंबर 2012

ठाकरे के खिलाफ बोलना कानूनन जुर्म

 शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे की मौत के बाद मुंबई बंद को लेकर फेसबुक पर कॉमेंट करना एक लड़की को महंगा पड़ा है। पुलिस ने इस 21 वर्षीय लड़की को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस ने लड़की पर धार्मिक भावनाओं को आहत करने और इनफॉर्मेशन टेक्नॉलजी ऐक्ट के सेक्शन 64 (a) के तहत केस दर्ज किया है। इसके अलावा उस लड़की को भी गिरफ्तार कर लिया गया है, जिसने इस कॉमेंट को लाइक किया था। हालांकि दोनों लड़कियों को बाद में जमानत पर छोड़ दिया गया।
पुलिस इन्सपेक्टर उत्तम सोनवने ने बताया कि 21 वर्षीय इस लड़की ने मुंबई के बंद पर सवाल उठाते हुए अपने कॉमेंट में लिखा था, 'ठाकरे जैसे लोग रोज़ पैदा होते और मरते हैं। इस वजह से मुंबई बंद करने की क्या ज़रूरत है?'
हालांकि लड़की ने अपना कॉमेंट हटा कर माफी भी मांग ली थी और पुलिस ने उनका फेसबुक अकाउंट भी बंद करवा दिया था, फिर भी रविवार की रात करीब 2000 शिव सैनिकों के ठाणे के पालघर स्थित लड़की के चाचा के क्लिनिक में जमकर तोड़फोड़ की थी।
लड़कियों की गिरफ्तारी का प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मार्केंडेय काटजू ने तीखा विरोध करते हुए मांग की है कि इसके लिए जिम्मेदार पुलिस ऑफिसरों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई की जाए।
जस्टिस काटजू ने सोमवार को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण को भेजे ई मेल में कहा है कि संविधान की धारा 19 (1) (ए) में नागरिकों को विचार अभिव्यक्ति का अधिकार मौलिक अधिकार के रूप में प्रदान किया गया है। ऐसे में मुंबई बंद का विरोध किए जाने पर किसी को धार्मिक भावनाएं भड़काने का आरोप लगाकर गिरफ्तार कर लेना बिल्कुल गलत है।

साभार:नवभारत टाइम्स 

रविवार, 18 नवंबर 2012

शिवसेना का निधन


 बाल ठाकरे का जन्म 23 जनवरी 1926 को मध्यप्रदेश के बालाघाट में हुआ बाल ठाकरे का पूरा नाम बालासाहेब केशव ठाकरे था बाल ठाकरे ने शुरू से ही हिंदुत्व की राजनति की और देश को धर्म को नाम पर अलग अलग कर दिया इसी हिंदुत्व की राजनीति के चलते बल ठाकरे ने बाबरी मस्जिद की शहादत की पूरी ज़िम्मेदारी ली और 1992-93 में मुंबई में जो दंगे हुए उसमे शिव सेना की भूमिका पर सवाल रहे कहा जाता है उन दंगो में शिव सेनिक वोटर लिस्ट लेकर घूम रहे थे ताकि मुसलमानों को तलाश कर करके मारा जाये मुंबई दंगों की जड़ तक पहुंचने के लिए जस्टिम श्रीकृष्णा जांच आयोग की स्थापना 1993 में हुई थी. जब यह आयोग अपना काम कर रहा था, उसी दौर में शिवसेना-भाजपा गठबंधन महाराष्ट्र में सत्ता में आया, जिसने तुरंत आयोग को भंग करने का फैसला किया. पूरे देश में हुए विरोध के कारण सरकार पर दबाव बना कि जस्टिस श्रीकृष्ण को उनका काम जारी रखने दिया जाए. मगर उसने 1998 में दी गई आयोग की रिपोर्ट को यह कहकर खारिज कर दिया कि वह राजनीति से प्रेरित है. आयोग ने शिवसेना नेताओं और कार्यकर्ताओं को दोषी करार दिया था और 31 पुलिसवालों पर सख्त कार्रवाई की सिफारिश भी की थी शिवसेना का हिंसक और विरोधी रुख सिर्फ भारतीय मुसलमानों के ही लिए नही रहा बल्कि शिवसेना ने देश के नगरीको में धर्म के नाम पर दरार डालने के बाद छेत्रवाद की राजनीति की और आज तक वो पूर्वोत्तर भारत व दक्षिण भारत के भारतीयों को मुंबई से खदेड़ने में लगे है ज़रा सोचिये वो आम गरीब आदमी जिसे भारतीय सविधान ने देश के किसी भी हिस्से में जाकर काम करने की आज़ादी दी है उसी आज़ादी को शिवसेना खतम करना चाहती है तो विचार करना होगा की आप शिवसेना के साथ है या फिर देश के सविधान के कोई भी तर्क या कुतर्क देश के सविधान से ऊपर धर्म और छेत्रवाद के नाम पर बटने वाले इंसान को नही रख सकता अब शिवसेना के युग का नत हो चूका है और देश मुंबई दंगो को भूल कर आगे पहुच चूका है लेकिन बिहार व उत्तर प्रदेश के वो लोग जो मुम्बई में हर लम्हा बालठाकरे के आतंक से सिहरे रहते थे अब शायद चेन की साँस ले सकेंगे शिवसेना ही बाल ठाकरे थी और बाल ठाकरे ही शिवसेना था इसलिए अब बाल ठाकरे की मोट के साथ ही शिवसेना ढलान की तरफ जानी शुरू होगी और मुंबई में पूर्वोत्तर के प्रवासी भारतीय मुंबई को भारत का हिस्सा ही समझेंगे जो बल ठाकरे की जीवित रहते मराठा मानुष से डरे रहते थे अब मुंबई के नागरिको को मराठी नही भारतीय कहा जाये तो जादा सही रहेगा और अब शायद उन्हें मराठी नही भारतीय होने पर गर्व होगा और मै आशा करता हू कि धर्म और छेत्रवाद के नाम पर देश के नागरिको को बटने वाले नेताओ को जनता करारा थप्पड़ लगायेगी और देश के सभी नागरिक अमन और भाई चारे के साथ देश के विकास में योगदान देंगे
फेसबुक पर अलका भारतीय का कहना है कि :-

१-बिहारी- एक बिहारी सौ बीमारी
२- मुसलमान - कैंसर की बीमारी
३-दलित - महारों ने सारी नौकरियां छीन ली
४-दक्षिण भारतीय - लुंगी हटाओ, पुंगी बजाओ
५-डॉ अम्बेडकर - अम्बेडकर के सारे पुतले गिरा दो !!
ऐसे नफरत फ़ैलाने इंसान के शव को तिरंगे में लपेटना तिरंगे का अपमान या नहीं
                                                  जय हिंद 

इंकलाब जिंदाबाद 

बुधवार, 7 नवंबर 2012

खौफ के साये में भारतीय मुसलमान


 यह बहुत दुख की बात है कि आजादी के 65 साल बाद भी भारतीय मुसलमान भय के साए में जी रहे हैं.आए दिन मुसलमानों की गिरफ्तारी की वजह से यहां का मुसलमान हमेशा इस डर में रहता है कि पता नहीं कब किसे पुलिस उठाकर ले और किसी झूठे मामले में फंसा दे. यह बातें राज्य सभा सांसद मोहम्मद अदीब ने पीपुल्स कैंपेन अगेंस्ट पॉलिटिक्स ऑफ टेरर के अंतर्गत एक कन्वेन्शन में कहीं। उन्होंने कहा कि बेकसूए मुस्लिम नौजवानों की रिहाई के लिए हम जो जंग लड़ रहे हैं बड़ी खुशी की बात है कि हमारी इस जंग में में केवल मुसलमान ही नहीं बल्कि हमारे लाखों कड़ोरों हिंदू भाई भी हमारे साथ हैं जो समझते हैं एक साजिश के तहत मुसलमानों को गिरफ्तार किया जा रहा है जो एक गलत बात है. उन्होंने कहा कि हमारी लड़ाई बहुत दूर तक जाएगी और न्याय मिलने तक यह जारी रहेगी।

अदीब ने कहा कि हम मुसलमान अपनी अलग दुनिया बसाना नहीं चाहते। हमारे देश का सिस्टम ही कुछ ऐसा है कि यहाँ हम सब हिन्दू मुस्लिम मिलकर ही रह सकते हैं और तरक़्क़ी कर सकते हैं। हम ऐसा करना भी चाहते हैं मगर हमें चैन से रहने क्यूँ नहीं दिया जाता। क्यूँ हमें शक कि निगाह से देखा जाता है और आतंकवाद के नाम पर हम पर ज़ुल्म किया जाता है।

नयी दिल्ली के मावलंकार हाल में आयोजित इस कन्वेन्शन को देश के कई बड़े नेताओं ने संबोधित किया। इस अवसर पर वैसे नौजवान भी मौजूद थे जिन्हें झूठे मुक़दमे में फंसाया गया और जो बाद में कई साल तक अपना कीमती जीवन जेल में गुजरने के बाद रिहा हुये। कन्वेन्शन में मुलायम सिंह यादव को भी आना था मगर वह क्यूँ नहीं आए इस पर लोगों में कानाफूसी होती रही।

इस अवसर पर लोकजनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष रमविलस पासवान ने कहा कि देश में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो यह नहीं चाहते की इस देश का हिन्दू मुस्लिम मिलकर रहे। आर एस एस , वी एच पी, बजरंग दल, और ऐसे दूसरे संगठनों का नाम लेते हुये उनहों ने कहा कि यह सब विघटनकारी संगठन हैं जो देश की एकता के लिए खतरा पैदा करते रहते हैं। पासवान ने बाबरी मस्जिद की याद दिलाते हुये कहा कि जिन लोगों ने उसे यह कहकर तोड़ दिया कि यह बाबर ने बनाया था तो फिर ऐसे लोग लाल क़िला या ताजमहल को क्यूँ नहीं तोड़ देते उसे भी तो मुसलमान राजा ने ही बनाया था। पासवान ने इस्लाम धर्म कि प्रशंसा करते हुये कहा कि हमारे यहाँ तो छोटी जाति के लोगों को मंदिर नहीं जाने दिया जाता लेकिन इस्लाम में तो सब बराबर है। इस्लाम कि शिक्षा के अनुसार यहाँ कोई छोटा और बड़ा नहीं है। अल्लाह कि नज़र में सब बराबर है। आतंकवाद के संबंध में रमविलस पासवान ने कहा कि आजकल पूरे दुनिया में मुसलमानों के खिलाफ एक साजिश चल रही है। भारत के संबंध में उनहों ने कहा कि यहाँ सिमी पर तो पाबंदी लगा दी गयी मगर आर एसएस जैसे संगठनों पर पाबंदी क्यूँ नहीं लगती? रमविलस ने मुसलमानों से अपील की है कि, यदि आप पर ज़ुल्म हो रहा है आप के ख्लफ साजिश हो रही है तो सड़कों पर निकलिए । सड़कों पर निकले बिना आपकी समस्या का सामाधान नहीं हो सकता। दुनिया को और देश को अपनी ताकत का अहसास कराईए तभी आपको इंसाफ मिलेगा। उनहों ने कहा कि देश में जो संप्रदायिङ्क ताक़तें हैं हमें उनके खिलाफ मिलकर लड़ना होगा। इस कन्वेन्शन को एक अच्छी शुरूआत बताते हुये पासवान ने कहा कि इसे सिर्फ कन्वेन्शन तक ही न रखें बल्कि इसे एक मिशन के तौर पर लें और देश की सभी सेकुलर ताकतों को मिलकर इस बुराई के खिलाफ आवाज़ बुलंद करें तभी हमें इसमें सफलता मिलेगी।

राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने बड़े बड़े मौलना के मुंह एक तरह का तमाचा मारते हुये कहा कि इस देश में मुसलमानों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है यहाँ मुस्लिम संगठनों में एकता नहीं है। हर कोई अपनी अपनी चला रहा है। उनहों ने कहा कि हद तो यह है कि चाचा और भतीजा में एकता नहीं है। लालू ने कहा कि जब तक आप में एकता नहीं होगी अप अपने हक़ कि लड़ाई नहीं लड़ सकते। एक फ्लैटफार्म पर आए बिना आपको इस देश में इंसाफ नहीं मिल सकता। उनहों ने मुसलमानों से अपील की कि आप अपनी मांगों या समस्या को लेकर रामलीला में जमा हों और अपनी आवाज़ बुलंद करें। मुस्लिम नौजवानों की आए दिन होने वाली गिरफ्तारी पर उनहों ने कहा कि यह सब एक प्लानिंग के तहत हो रहा है। पोलिस की अपनी हिम्मत नहीं है कि वह मुस्लिम बच्चों को गिरफ्तार करे पुलिस को तो कोई और कंट्रोल कर रहा है। उस कंट्रोल टावर को कंट्रोल करने कि ज़रूरत है।

उत्तर प्रदेश में बनी नयी सरकार के संबंध में लालू ने कहा कि सबको पता है कि समाजवादी पार्टी सिर्फ और सिर्फ मुसलमानों के वोट की वजह से ही सरकार बना ने में सफल हुई। अगर मुसलमान हमेशा इसी एकता का परिचय दें तो उनके दिन बादल सकते हैं।

सी पी आई नेता ए बी बर्धन, प्रकाश करात, डी राजा और अतुल अंजान ने भी माना कि मुसलमनोन पर ज़ुल्म हो रहा है और इस ज़ुल्म को रोकने के लिए सेकुलर ताकतों को एकजुट होना होगा। इन सबने कहा की जिस प्रकार मूसलिम बच्चों को आए दिन गिरफ्तार कर के जेल में डाला जा रहा है वह एक सेकुलर देश के लिए चैलेंज है। अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष वजाहत हाबिबुल्लाह ने कहा कि जो पोलिस वाले मुस्लिम नौजवान को बिना कसूर के उनकी ज़िंदगी खराब करते हैं उनके खिलाफ भी कारवाई होनी चाहिए। इस अवसर पर कुँवर दानिश आली और मनीषा सेठी ने अपनी बातें रखीं। मनीषा ने कई मिसाल देते हुये यह बताया कि किस प्रकार पोलिस मुस्लिम नौजवानों को झूठे मुक़दमे में फँसाती है और बाद में यह सब बरी तो हो जाते हैं मगर तब तक उनका जीवन बर्बाद हो चुका होता है। इस कनवेशन का संचालन नौजवान नेता अमीक जामेई ने किया। अमीक ने एलान किया कि इंसाफ मिलने तक सेकुलर ताकतों कि मदद से हमारी यह जंग जारी रहेगी।

इन्कलाब जिंदाबाद 


सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

भाजपा क्यों चुप है ....?

करप्शन के आरोपों से घिरे केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद पर अरविंद केजरीवाल के एक के बाद एक जोरदार हमले जारी हैं। केजरीवाल आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं, लेकिन इन सब के बीच देश की मुख्य विपक्षी पार्टी बीजेपी चुप है। पार्टी का कोई भी सीनियर नेता खुलकर कुछ नहीं बोल रहा है। मुख्य विपक्षी पार्टी की यह चुप्पी अब सवालों के घेरे में है। सोमवार को इस मामले में केजरीवाल ने भी चुटकी ली। उन्होंने कहा कि देश की मुख्य विपक्षी पार्टी बीजेपी चुप है। बीजेपी को डर है कि उसके नेताओं के खिलाफ भी करप्शन के सबूत पेश किए जा सकते हैं। ऐसे में अगर हम कांग्रेसी नेताओं के मुद्दे पर चुप रहेंगे तो कांग्रेसी भी हमारे मुद्दे पर चुप रहेंगे। केजरीवाल ने इशारों ही इशारों में बीजेपी और कांग्रेस के बीच 'सेटिंग' का आरोप लगा डाला।
सलमान खुर्शीद के मुद्दे पर पूरा देश आंदोलित है। हर कोई सचाई जानना चाहता है। टीम केजरीवाल ने एक के बाद एक कई हमले बोले हैं, लेकिन देश की मुख्य विपक्षी पार्टी बीजेपी चुप है। बीजेपी की इस चुप्पी ने कई सवाल पैदा कर दिए हैं। इस चुप्पी पर कई लोग चुटकी भी ले रहे हैं।
चुप्पी बीजेपी की रणनीति का हिस्सा!
 सूत्रों की मानें तो बीजेपी ने एक रणनीति के तहत ऐसा किया है। बीजेपी को डर है कि अरविंद केजरीवाल का अगला निशाना पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी हो सकते हैं। ऐसे में वह नहीं चाहती है कि किसी कांग्रेसी नेता खिलाफ पार्टी नेता आक्रामक अंदाज में बोलें। कहा जा रहा है कि बीजेपी और कांग्रेस के बीच इस मसले पर समझौता भी हो गया है। अरविंद केजरीवाल द्वारा एक दूसरे के नेताओं खिलाफ मुद्दा उठाने पर दोनों पार्टियां चुप्पी साध लेंगी।
हिंदी न्यूज चैनल आज तक के स्टिंग ऑपरेशन में सलमान खुर्शीद और उनकी पत्नी लुईस खुर्शीद के जाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्ट में धांधली का खुलासा किया गया था। इसमें विकलांगों के नाम पर पैसों की बंदरबांट की बात सामने आई थी।
गौरतलब है कि बीजेपी के भी अधिकतर नेताओं के एनजीओ और ट्रस्ट हैं। सूत्रों की मानें तो इनके ट्रस्टों और एनजीओं में भी खूब घोटाले हुए हैं। इन्होंने भी सरकारी पैसों की बंदरबांट की है। कहीं इनके खिलाफ भी कोई सबूत पेश न कर दिया जाए, इसीलिए ये चुप हैं।


गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

सेकुलरों का असली चेहरा

देश में आज तक कोई भी दल बिना मुस्लिम समर्थन के सत्ता में नही आया हे अब कुछ लोग कहेंगे की बीजेपी आई थी तो सुनो उसने भी फरुखाब्दुल्लाह (कश्मीर ) का समर्थन लिया था और वेसे भी उसे पूर्ण बहुमत नही आया इसका  18% मुस्लिमो का विरोध करके भी बाकि के दम पर सत्ता नही मिल सकी इसलिए मुस्लिम वोटो की बहुत अहमियत हे हर कोई मुस्लिमो को अपनी तरफ लाना चाहता हे देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस मुस्लिमो को अपनी तरफ खीचने के लिए हिंदू आतंकवाद और हिंदुत्वा से डराती हे बेचारा मुलिम सोचता हे की कांग्रेस हमे बचा लेगी लेकिन ऐसा नही हे लेकिन मुस्लिम बीच में फस चुके हे कांग्रेस को छोड़कर किसके साथ जाये सभी तो मुस्लिमो को इस्तेमाल करते हे 17 अगुस्त 2010 को दिल्ली विधान सभा में कांग्रेस के विधायक नसीब सिंह ने मुस्लिमो के बारे में कहा की मुस्लिम गंदे होते हे और गंदगी में रहना पसंद करते हे उस वक़्त शिला दीक्षित भी मोजूद थी कांग्रेस की राजनीति सिर्फ मुस्लिमो को डराकर उनका वोट हथियाने तक ही सीमित  हे पिछले वक्त रामविलास पासवान जिन्होंने कभी मुस्लिम मुख्यमंत्री की मांग करके बिहार के मुस्लिमो को लुभाना चाहा था वो भी मुस्लिम विरोधी बीजेपी की सरकार में रेलमंत्री व इस्पात मंत्री थे मायावती भी मुस्लिमो के वोटो से वजूद में आई और सत्ता के लिए बीजेपी से समर्थन लिया जो मुस्लिमो विरोधी दल हे हलाकि इस लोकसभा में भाजपा भी मुस्लिमो को लुभाने की कोशिश में रही जिसके लिए संघ परिवार के नेता मुस्लिम मंचो पर देखे गए और उन्होंने मुस्लिमो को बराबर हक दिलाने की मांग भी की थी 
मुस्लिम तो सिर्फ सम्पर्दायिक विरोधी हे इसलिए वो ये नही देखते कि कौन दोस्त और दुश्मन हे वो सिर्फ बीजेपी को हराना चाहते हे इसलिय जो भी पर्त्याशी बीजेपी को हरा सकता हे चाहे वो किसी भी पार्टी का हो को वोट देते हे जबकि मुस्लिम चाहे तो अपनी पार्टी को लाकर सरकार को अपना पंगु बना सकते हे कुछ लोग कहेंगे की मुस्लिमो में एकता कम हे तो सुनो मुस्लिम कौम में इतनी एकता हे की अगर ज़ुल्म इराक में होता हे तो दुआ हिंद की हर मस्जिद में होती हे मुहम्मद साहब का अपमान किसी और मुल्क में होता हे गुस्सा हिंद के मुसलमान को आता हे मुस्लिम देश में अमन चाहते हे वो दहशत गर्द नही हे इसलिए ही तो सम्पर्दायिक पार्टी बीजेपी का विरोध करते हे और पूरा हक न मिलने से कुछ मुस्लिम बगावत पर ज़रूर उतर आये हे एक बात समझ नही आती जब कश्मीर में मुस्लिम बंद करते हे तो पुलिस गोलिया चलाती है और कई को मार देती हे क्योकि उन्होंने पत्थर बरसाए लेकिन दूसरी और वो नक्सली हे जो पुलिस को मार रहे हे और अपनी सरकार चला रहे हे उन पर गोली नही चलायी जाती तो मुझे लगा के नक्सली कितनी गोली चला दे वो अपने हे और कश्मीरी अपने नही हे जब गोली के बदले गोली नही चल सकती तो पत्थर के बदले क्यों चल रही हे कश्मीर हमारा हे मगर कश्मीरी नही ये केसे भेदभाव हे जो देश को अलगाव की और ले जा रहा हे मुस्लिम अपने देश में ही गैर बन रहे हे बसपा से लेकर बीजेपी सब मुस्लिम राजनीति कर रहे हे कोई मारकर तो कोई डराकर

शनिवार, 25 अगस्त 2012

कहाँ गया वो भारत .....???


 खून-खराबा, जुल्मो-सितम, दहशतगर्दी अब हावी है 
सहमा सहमा हे हर मंज़र सबका दमन दागी है 
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सबका सपना कहाँ गया 
वो भारत अपना कहाँ गया वो भारत अपना कहाँ गया 

जिस भारत की मिटटी में आबे गंगा की अजमत थी
जिस भारत के सिने में हर एक की खातिर चाहत थी
जिस भारत के घर की जीनत मरयम, जैनब, सीता थी
जिस भारत के दिल में कुरान और हाथो में गीता थी
जिस भारत में नानक ने वहदत का गीत सुनाया था
वो भारत इकबाल ने जिसको अपनी जान बताया था
जिस भारत की अज़ान में शामिल होकर शंखे बजती थी
जिस भारत की मूरत जुम्मन के हाथो सजती थी
वो भारत अपना कहाँ गया वो भारत अपना कहाँ गया

जिस भारत में पैदा होकर सब किस्मत पर इतराते थे
जिस भारत की वादी में हम मीर की गजले गाते थे
जिस भारत के खेतों में सरसों की मादक खुशबु थी
जिस भारत की सुखी रोटी में भी खुशहाली हरसू थी
जिस भारत में हम सब मिलकर मंदिर जाते थे
जिस भारत में दुर्गा को हम अपनी बहन बताते थे
जिस भारत में हिंदू-मुस्लिम का रिश्ता रूहानी था
फिरका, मज़हब, कौम के बढ़कर जज्बा हिन्दुस्तानी था
वो भारत अपना कहाँ गया वो भारत अपना कहाँ गया

जिस भारत के आगे तकातवर फिरंगी घुटने टेक दिए
टीपू की एक ललकार से दुश्मन तलवारे फैक दिए
जिस भारत ने चाहत को एक नया अंजाम दिया
तारीख के पन्नों पर अंमित ताजमहल का नाम दिया
जिस भारत में प्रेम दीवाने कितने रांझे, हीर हुए
जिस भारत में पैदा ग़ालिब, तुलसी, मीर, कबीर हुए
जिस भारत की मिटटी में बहकर गंगा इतराती थी
जिस भारत की ईद को दिवाली भी गले लगाती थी
वो भारत अपना कहाँ गया वो भारत अपना कहाँ गया

ये किस्सा था उस सोने की चिड़िया जिसकी पहचान थी
आओ अब तुम्हे तस्वीर दिखाऊ आज के हिंदुस्तान की
अश्फाकुल्लाह, बिस्मिल की वो क़ुरबानी बेकार गयी
अमन की देवी भारत माँ अपनों के हाथो हार गयी
कही पर मंदिर मस्जिद के झगडो ने क़त्ले आम किया
कही पर माँ बहनों की इज्ज़त को सबने नीलाम किया
पुरे मुल्क को जंग का एक मैदान बना डाला सबने
बेबस और अपाहिज हिंदुस्तान बना डाला सबने
वो भारत अपना कहाँ गया वो भारत अपना कहाँ गया

खून में डूबा मंज़र मुल्क की चीख न बन जाये एक दिन
ये अपनी तहज़ीब कही तारिख न बन जाये एक दिन
मथुरा और गुजरात के दंगो से जब हम बट जायेंगे
रफ्ता रफ्ता हम इतिहास के पन्नों से मिट जायेंगे
तब इस टूटे भिखरे मुल्क को नाम बताओ क्या दोगे
आने वाली नस्लों को पैगाम बताओ क्या दोगे
पुरखो की इस मिटटी की पहचान कहाँ से लाओगे
मुझे बताओ फिर ये हिन्दुसत्न कहाँ से लाओगे
वो भारत अपना कहाँ गया
ढूंड रही है नाम आँखे
वो भारत अपना कहाँ गया
spacial thanks to ashraf azmi
inqlaab zindabad

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

पुलिस से डरे नही सिर्फ ये जानकारी रखे


हर समय अनजान डर का साया और सवालों का घेरा अल्पसंख्यक होने के एहसास को और भी मुश्किल कर देता है. नाम के साथ मोहम्मद, आलम या अली लगा हो तो हर नज़र शक में, शक सवालों में और सवाल उत्पीड़न में बदल जाते हैं. अख़बार की सुर्खियां खौफ़ पैदा करती हैं तो सुरक्षा एजेंसियों की करगुजारियां और बयान चेतना पर हावी हो जाते हैं. ऐसा लगता है जैसे अल्पसंख्यक होने का मतलब नए दौर के भारत में डर और खौफ़ के साये में रहना ही हो गया है.

हमारे मुल्क के संविधान ने सभी वर्गों के लोगों को समान मानवाधिकार दिए हैं लेकिन अल्पसंख्यकों के लिए इनका अहसास भी अलग है. अल्पसंख्यक सरकार से लेकर समाज और व्यवस्था तक कहीं भी और किसी भी वक्त अपना मानवाधिकार खो सकते हैं.

लेकिन बात यहीं पर खत्म नहीं हो जाती. अल्पसंख्यक अपना मानवधिकार खो सकते हैं, ये तो समस्या का सिर्फ एक पहलू भर है. चुनौती उससे भी बड़ी है. अपने मानवाधिकारों के लिए आवाज बुलंद करना आज और बड़ा खतरा हो गया है. कोई अल्पसंख्यक अपने अधिकारों की मांग करता है तो आमतौर पर उसे पीड़ित की नज़र से नहीं, बल्कि एक अल्पसंख्यक की नज़र से ही देखा जाता है.

हमारी एजेंसियां ऐसा बर्ताव करती हैं जैसे मानवाधिकार पर उसका हक़ ही न हो. कभी-कभी तो अल्पसंख्यकों से दूसरे ग्रहों के प्राणियों जैसा बर्ताव किया जाता है.

उसकी चीख, रोना किसी जायज गुनाह की सजा जैसा होगा और अगर उसने मुखालफत का साहस किया तो उसके चेहरे पर एक झटके में आतंकवाद का पेंट पोत दिया जाएगा और फिर एक और जिंदगी अदालत और जेल के बीच पिस जाएगी.

इसमें कोई शक नहीं कि आज हालात बद से बदतर हो गए हैं. लेकिन फिर भी देश में रह रहे एक बड़े अल्पसंख्यक वर्ग को हमारे संविधान और न्याय व्यवस्था में पक्का भरोसा है. लेकिन सबसे बड़ी परेशानी यह है कि हम अपने अधिकारों के बारे में बेदार नहीं.

बेदारी का सबसे पहला सबक यह है कि पुलिस जो हम पर अक्सर अत्याचार करती है, वह तानाशाह नहीं है बल्कि हमारी नौकर है और हमारी सुरक्षा के लिए उसे बहाल किया गया है. जनता की रक्षा करना और अन्य अपराधों के बारे में जनता में समझ पैदा करना और उनके रोकथाम के लिए प्रभावी उपाय करना पुलिस की कानूनी जिम्मेदारी है. इससे अलग अगर पुलिस कुछ भी करती है तो उस पर सवाल उठाने चाहिए.

अक्सर कहा जाता है कि पुलिस की पकड़ में आने पर गूंगे के मुंह में भी ज़बान आ जाती है, अच्छे-अच्छे बोलने लगते हैं, निर्दोष गुनहगार हो जाते हैं. कहने की इस बात को इतनी बार कहा गया है कि अब यही अंतिम सत्य लगता है. जबकि सच्चाई कुछ और है. पुलिस बेगुनाहों को गुनाहगार बनाने के लिए नहीं बल्कि बेगुनाहों को बचाने के लिए हैं. पुलिस की पकड़ में आए हर व्यक्ति के भी अधिकार हैं.

यहां यह जानना ज़रूरी है कि पुलिस किसी को कब और किस परिस्थिति में गिरफ्तार कर सकती है और गिरफ्त में आए व्यक्ति के पास क्या-क्या कानूनी अधिकार हैं. कानूनी अधिकारों की यह समझ बहुत से लोगों को बेवजह मुश्किलों में फंसने से बचा सकती है और अत्याचार पर उतारू पुलिस को भी सबक सिखा सकती है.

-पुलिस अधिकारी को किसी की गिरफ्तार करने का अधिकार तभी है जब उसके पास उसके गिरफ्तार करने का कोई ठोस कारण हो. जब भी हमारे आस-पास कोई पुलिस अधिकारी किसी की गिरफ्तारी करने आए तो हम पुलिस से उसका कारण पूछें और जब कारण से आप संतुष्ट हो जाएं तब ही उस व्यक्ति को गिरफ्तार करके ले जाने का मौका दें, बल्कि हो सके तो उसकी खबर मीडिया और वहां के सामाजिक और राजनीतिक नेताओं को भी दें और यह भी हमेशा याद रखे कि आम परिस्थितियों में किसी व्यक्ति के खिलाफ मानवाधिकार हनन का केवल आरोप होने पर कोई गिरफ्तारी नहीं की जा सकती.

-जब किसी जूनियर अधिकारी को किसी की बिना वारंट गिरफ्तारी पर तैनात किया गया हो तो ऐसी स्थिति में उसके पास एस.एच.ओ. का दिया हुआ एक लिखित आदेश जरूर होगा, जिसमें आवश्यक परिस्थिति में बिना वारंट गिरफ्तारी का आदेश और उसका औचित्य (Grounds) लिखा होगा. ड्यूटी पर मौजूद जूनियर अधिकारी द्वारा गिरफ्तार किए जा रहे व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी के आदेश के कारण को बताना होगा और अगर वह व्यक्ति अपनी गिरफ्तारी के आदेश को देखना चाहता है तो वह आदेश भी दिखाया जाएगा. हमें किसी की गिरफ्तारी के दौरान यह भी ध्यान रखना चाहिए कि गिरफ्तारी या इन्ट्रोगेशन करने वाले पुलिस अधिकारियों के नाम और पद के टैग लगाए हुए हैं या नहीं? साथ ही इस बात की भी पुष्टि कीजिए कि पुलिस अधिकारियों द्वारा गिरफ्तारी या इन्ट्रोगेशन का प्रविष्टी पुलिस स्टेशन के रजिस्टर में उसी समय समांतर रूप से किया जा रहा है या नहीं?

-जो पुलिस अधिकारी गिरफ्तारी या इन्ट्रोगेशन कर रहा है उसे स्पष्ट तौर पर अपनी पहचान जाहिर करनी होगी और अपने नाम और पद का टैग लगाए रखना होगा.

-गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को जल्द से जल्द उसकी गिरफ्तारी के आधार की जानकारी दी जाएगी और वकील की सेवाएं प्राप्त करने के अधिकार से उसे सूचित किया जाएगा.

-गिरफ्तारी करने आने वाला कोई पुलिस अधिकारी गिरफ्तारी के समय अवश्य ही एक अरेस्ट मेमो तैयार करेगा, जिसकी पुष्टि न्यूनतम एक गवाह द्वारा किया जाएगा जो या तो गिरफ्तार किए गए व्यक्ति के परिवार का कोई व्यक्ति होगा या फिर इस क्षेत्र का कोई सम्मानित व्यक्ति. यही नहीं, बल्कि अरेस्ट मेमो में गिरफ्तारी का दिनांक और समय दर्ज किया जाएगा और गिरफ्तार किया गया व्यक्ति भी अरेस्ट मेमो पर हस्ताक्षर करेगा, और उसकी एक प्रति उसे दी जाएगी.

-किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय पुलिस उस व्यक्ति के सम्मान व इज़्ज़त को ठेस नहीं पहुंचा सकती. पब्लिक के सामने व्यक्ति के प्रदर्शन या परेड किसी भी कीमत पर नहीं कराया जा सकता है.

-कानून के अनुसार गिरफ्तार किए गए व्यक्ति की तलाशी लेते समय जबर व हिंसा से काम नहीं लिया जाएगा और उसकी इज़्ज़त और आबरू का पूरा ध्यान रखा जाएगा और उसके प्राईवेसी के अधिकार का भी ध्यान रखा जाएगा.

-बिना वारंट के किसी भी मामले में मानव अधिकारों और नागरिक अधिकारों के कार्यकर्ताओं बल्कि सच पूछिए तो हम सब की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है. पुलिस पर यह जिम्मेदारी बनती है कि वह जैसे ही किसी व्यक्ति को बिना वारंट गिरफ्तार करने आती है उसे तुरंत गिरफ्तार व्यक्ति को उसके अधिकारों से उसी की भाषा में पूरी तरह सूचित करे, जिस भाषा को वह गिरफ्तार व्यक्ति अच्छी तरह जानता और समझता हो. पुलिस को यह भी सलाह दी गई है कि ऐसे मामलों में सम्मानित नागरिकों से मदद लें. इस संबंध में मानव अधिकारों और नागरिक अधिकारों के कार्यकर्ताओं बल्कि हम सब गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी के कारण की तफतीश कराने में अहम भूमिका निभा सकते हैं. मानव अधिकारों और नागरिक अधिकारों के कार्यकर्ताओं को बल्कि हम सबको इस बात की पुष्टि कर लेनी चाहिए कि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी की आधारों को समझा दिया गया है या नहीं? और ठीक वही बातें पुलिस रिकार्ड में भी गिरफ्तारी के आधार के रूप में दर्ज की गई हैं या नहीं?

-गिरफ्तार व्यक्ति को उसके उपरोक्त अधिकार से अवगत करने के अलावा पुलिस द्वारा यह सूचना दी जानी चाहिए कि वह अपनी पसंद के वकील के ज़रिए अपना बचाव कर सकता है. उसे इस बात की जानकारी भी दी जानी चाहिए कि वह राज्य के खर्च पर मुफ्त कानूनी सहायता प्राप्त करने का हकदार है.

-सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के अनुसार गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर अदालत में पेश किया जाएगा.

-अगर कोई व्यक्ति किसी योग्य गारंटी अपराध के आरोप में गिरफ्तार किया गया है तो उसे लाज़मी तौर पर बताया जाएगा कि उसे जमानत पर रिहाई का अधिकार है. उसे ज़मानत या ज़मानतकारों से संबंधित जानकारी भी देनी चाहिए.

-गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को इन्ट्रोगेशन के दौरान में किसी भी समय अपने वकील से मिलने की अनुमति दी जानी चाहिए. इन्ट्रोगेशन किसी ऐसी जगह पर होना चाहिए जिसका पता साफ़ मालूम हो और जिसे सरकार द्वारा इस कार्य के लिए विशेष किया गया. वह जगह ऐसी होनी चाहिए जहाँ वह आसानी पहुँच सके और गिरफ्तार किए गए व्यक्ति के रिश्तेदार या दोस्तों को यह जरूर बताया जाना चाहिए कि किस स्थान पर इन्ट्रोगेशन चल रहा है. साथ ही कानून यह भी कहता है कि इन्ट्रोगेशन के दौरान किसी के जीवन, उसके आत्म-सम्मान और उसके स्वतंत्रता के अधिकार को किसी भी हाल में ठेस नहीं पहुंचना चाहिए.

-Arresting या Escorting अधिकारी की सुविधा के लिए भी आम हालात में बेड़ियों या हथकड़ियों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. अगर किसी कारण हथकड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है तो उसका पंजीकरण डेली डायरी रिपोर्ट में किया जाना चाहिए. मिजस्ट्रेट की अनुमति के बिना किसी गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को कस्टडी से कोर्ट तक हथकड़ी पहना कर यहां से वहां ले जाना मना है.

-अगर गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को अदालत से आदेश प्राप्त करने के बाद रिमांड पर पुलिस कस्टडी में रखा गया हो तो कस्टडी में हिरासत के दौरान हर 48 घंटों के अंदर-अंदर एक प्रशिक्षित मेडीकल अधिकारी जो स्वीकृत डॉक्टरों के पैनल पर होगा और जिसे संबंधित राज्य के निदेशक , हेल्थ सर्विसिज़ द्वारा अपवाइंट किया गया हो, द्वारा गिरफ्तार किए गए व्यक्ति का स्वास्थ्य परीक्षण कराया जाना चाहिए. पुलिस कस्टडी से रिहाई के समय गिरफ्तार व्यक्ति का चिकित्सा परीक्षण किया जाएगा जिसमें उसकी वास्तविक स्थिति का बयान होगा कि उक्त व्यक्ति पर किसी घाव या ज़ख्म का अस्तित्व है या नहीं?

-गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को अपने दोष के स्वीकार या अपने खिलाफ गवाही देने पर मजबूर नहीं किया जाएगा.

-पुलिस को दिए जाने वाले किसी बयान पर जांच के दौरान गिरफ्तार किए गए व्यक्ति से हस्ताक्षर नहीं कराया जा सकता.

-किसी गिरफ्तार किए गए व्यक्ति की फोटोग्राफी तब तक नहीं की जानी चाहिए जब तक कि ऐसा करने की लिखित परमिशन न हो. तथा गिरफ्तार हुए व्यक्ति की फोटोग्राफी से पहले उसकी अनुमति सुप्रीटेंडेंट ऑफ पुलिस या डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस या क्रिमीनल इन्वेस्टीगेशन विभाग से पेशगी मंजूरी न ले ली जाए.

वैसे पुलिस की काली करतूतों की घटनाओं से न जाने कितने ही पन्ने काला किए जा सकते हैं, लेकिन ताजा मामला हमारे ध्यान में होना चाहिए कि किस तरह हैदराबाद के मक्का मस्जिद में पुलिस ने निर्दोष मुस्लिम युवाओं को सलाखों के पीछे धकेल दिया…. और फिर उन्हें मुआवजा देना पड़ा, लेकिन हमारी कोशिश यह है कि अगर गलती से भी पुलिस आपको ऐसे मामलों में धकेलती है तो सावधान हो जाए. अपने अधिकार हमेशा अपने मन में याद रखें. हम किसी को डरा नहीं रहे हैं, बल्कि देश में हालात ऐसे हैं कि अपनों को सूचित करना हमारी मजबूरी बन गई है.

इसमें कोई शक नहीं है कि हमारे देश में बहुत से निर्दोष पुलिस की पकड़ में आ कर गुनाहगार हो गए. न उन्हें पुलिस ने माफ किया न समाज ने. पुलिस की गलती है लेकिन इससे ज्यादा गलती उनकी है जिन्होंने गिरफ्तारी अपनी किस्मत समझ लिया और चुप बैठ गए. हमारी चुप्पी बहुत कुछ हमसे छीन चुकी है. अब हमें अपनी आवाज़ बुलंद करनी ही होगी. अगर आपके सामने कोई निर्दोष पुलिस की पकड़ में आता है तो चुप नहीं बैठे, हर संभव तरीके अपनी आवाज उठाएंगे. क्योंकि कानून सो सकता है, लेकिन बहरा नहीं हो सकता, आपकी बुलंद आवाज़ को उसे सुनना ही पड़ेगा.

लेखक:- अफरोज आलम साहिल

इन्कलाब जिंदाबाद

सोमवार, 18 जून 2012

गोधरा का सच

 गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बे जलाए जाने के आरोप में 90 से अधिक लोग गिरफ़्तार हुए थे जिनमें से 63 को पिछले साल पहले रिहा कर दिया गया और बाक़ी 31 को दोषी क़रार दिया गया था जिन 63 लोगों को रिहा किया गया उन पर लगे आरोप तो सिद्ध नहीं हो पाए लेकिन इन लोगों की जिंदगी केबेशकीमती नौ साल बर्बाद ज़रुर हो गए.
गोधरा शहर से थोड़ी दूर रहमतनगर की झुग्गियों से कई लोगों को पकड़ा गया था हबीब उन्हीं में से एक हैं. हबीब तो छूट गए लेकिन उनके दो भाई अभी भी जेल में हैं. हबीब के पिता मीडिया से बेहद नाराज़ दिखे और बार-बार आग्रह किए जाने का एक ही जवाब देते रहे, ''हमें मीडिया से कोई बात नहीं करनी. मेरी फोटो मत खींचना. बिल्कुल बात नहीं करनी बड़ी मुश्किल से हबीब बातचीत के लिए तैयार हुए तो नाराज़गी फट पड़ी,
"अभी बताओ हम क्या करें. नौ साल बर्बाद हुए मेरे. कोई लौटाएगा. दो भाई अभी भी बंद हैं. गोधरा में गाड़ी जलाई. हम लोग इधर झुग्गियों में थे. पुलिस उठा के ले गई. बंद कर दिया तब बताया कि क्यों बंद किया. हम तो स्टेशन से बहुत दूर थे."
शब्बीर भी इन्हीं झुग्गियों में रहते हैं. उन्हें बात करने से आपत्ति नहीं और उनका गुस्सा साफ़ था कि निर्दोष लोग जेल में हैं शब्बीर कहते हैं, ''अभी भी हम कहते हैं कि मामले की सीबीआई जांच होनी चाहिए. मैं रिहा हुआ लेकिन मामले की जांच ठीक से नहीं हुई. निर्दोष लोग अंदर बंद हैं. जांच होगी तभी मालूम चलेगा किसने किया था डिब्बा में आग लगाने का काम.'' शब्बीर जब गिरफ़्तार हुए तब उनकी पत्नी रेहाना आठ महीने के गर्भ से थीं. बेटी पैदा हुई लेकिन शब्बीर अपनी बेटी को नौ साल के बाद ही छू पाए रेहाना कहती हैं, ''जब ये पैदा हुई तो इसका बाप जेल में था. हमें छह महीने तक मिलने नहीं दिया गया. फिर जाते थे तो जाली के पार से बच्ची को दिखाया इन्हें. छू नहीं पाते थे अपनी बच्ची को. ये अपने बाप को पहचानती भी नहीं थी. एक साल पहले जब वापस आए तो पहली बार बच्ची को छुआ. तब ये साढ़े आठ साल की हो गई थी.''
रेहाना जैसी कई महिलाओं ने ये नौ साल मज़दूरी कर के गुज़ारे हैं. रेहाना बताती हैं कि बस्ती से गिरफ़्तार किए गए 11 लोग ग़रीब परिवार के हैं और सभी लोग मेहनत मज़दूरी कर के गुज़ारा चलाते हैं. वो कहती हैं, ''हम बर्तन मांज मांज के घर चलाते रहे इतने दिन. दो बेटियां हैं.पति जेल में था. भूखे मर जाते हम लोग. हमारा पति तो लौटा लेकिन अभी भी बस्ती के तीन चार लोग जेल में हैं. ये तो अन्याय है.''
ग़रीब बस्तियों में लोग बात कर लेते हैं लेकिन कई सभ्रांत घरों के लोगों को भी षडयंत्र रचने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया.
इन्हीं में से एक हैं रुहुल अमीन अठीला. पेशे से वकील. अठीला मिलने को तैयार हुए लेकिन पहली ही बात कही. न इंटरव्यू दूंगा न फोटो लेने दूंगा. आइए आपको चाय पिलाता हूं अठीला से आधे घंटे की मुलाक़ात में बार-बार इंटरव्यू के लिए ज़ोर देता रहा लेकिन अठीला तैयार नहीं हुए. उनकी आंखें मानो साफ़ कह रही हों- 'मैं मजबूर हूं तुम समझने की कोशिश करो.'
बातचीत के दौरान मोहम्मद हुसैन कलोटा से मुलाक़ात हुई. कलोटा पूर्व में गोधरा म्युनिसिपैलिटी के अध्यक्ष रह चुके हैं और गोधरा की घटना के बाद गिरफ़्तार किए गए थे. कलोटा पर भी षडयंत्र रचने का आरोप था लेकिन वो बरी किए गए हैं. कलोटा ने भी इंटरव्यू देने से इंकार कर दिया.

जो पेशे से वकील हों या फिर सम्मानित नागरिक, उनका गिरफ़्तार होना फिर उनका बाइज़्ज़त छूट जाना अजीब तो लगता है लेकिन सबसे अजीब लगा उनका आरोपों से बरी होने के बाद भी मीडिया से बात न करना ऐसा क्या खोफ है जो उन्हें बोलने भी नही देता और जिंदगी के नो साल बेगुनाह होने के बाद जेल में काटे और फिर भी ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ दबी हुयी है जाने क्यों ...?
गोधरा कांड के बाद हुए दंगो में योग्नाबंद तरीके से मुस्लिम समुदाय का नरसंहार हुआ था ये भी याद रखने वाली बात हे कि रेल मंतारालय कि जांच में ये सिर्फ एक हादसा था ट्रेन के दब्बो के देखने से पहली नज़र में ही लगता हे कि आग अंदर से लगी थी क्योकि बहार ट्रेन के निचले हिस्से का पैंट नही जला था अब ये साजिश थी या कुछ और कहना मुश्किल हे लेकिन इस बात से इंकार नही किया जा सकता कि ये एक राजनीतिक साजिश का हिस्सा हो क्योकि इस घटना के बाद मुस्लिम समुदाय का नरसंहार हुआ जो सरकारी इशारे पर होने के आरोप आज तक लग रहे हैं और वो नरसंहार एक हैवानियत थी ये अजीब तो है लेकिन गोधरा का सच यही है.

spacial thank to Danish Akhtar Khan

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

राष्ट्रपिता बाबा साहब अम्बेडकर

 जन्म 
देश के राष्ट्र पिता बाबा साहब आंबेडकर 14 अप्रैल 1891 को मध्यप्रदेश के महू में एक गरीब अस्पृश्य परिवार मे पैदा हुए वे रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई मुरबादकर की १४ वीं व अंतिम संतान थे। उनका परिवार मराठी था और वो अंबावडे नगर जो आधुनिक महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले मे है, से संबंधित था। वे हिंदू महार  जाति से संबंध रखते थे, जो अछूत कहे जाते थे और उनके साथ सामाजिक और आर्थिक रूप से गहरा भेदभाव किया जाता था। अम्बेडकर के पूर्वज लंबे समय तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में कार्यरत थे, और उनके पिता,भारतीय सेना  मऊ छावनी में सेवा में थे और यहां काम करते हुये वो सूबेदार के पद तक पहुँचे थे। उन्होंने मराठी और अंग्रेजी में औपचारिक शिक्षा की डिग्री प्राप्त की थी। उन्होने अपने बच्चों को स्कूल में पढने और कड़ी मेहनत करने के लिये हमेशा प्रोत्साहित किया।कबीर पंथ से संबंधित इस परिवार में, रामजी सकपाल, अपने बच्चों को हिंदू ग्रंथों को पढ़ने के लिए, विशेष रूप से महाभारत और रामायण प्रोत्साहित किया करते थे। उन्होने सेना मे अपनी हैसियत का उपयोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूल से शिक्षा दिलाने मे किया, क्योंकि अपनी जाति के कारण उन्हें इसके लिये सामाजिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा था। स्कूली पढ़ाई में सक्षम होने के बावजूद आंबेडकर और अन्य अस्पृश्य बच्चों को विद्यालय मे अलग बिठाया जाता था और अध्यापकों द्वारा न तो ध्यान ही दिया जाता था, न ही कोई सहायता दी जाती थी। उनको कक्षा के अन्दर बैठने की अनुमति नहीं थी, साथ ही प्यास लगने प‍र कोई ऊँची जाति का व्यक्ति ऊँचाई से पानी उनके हाथों पर पानी डालता था, क्योंकि उनको न तो पानी, न ही पानी के पात्र को स्पर्श करने की अनुमति थी। लोगों के मुताबिक ऐसा करने से पात्र और पानी दोनों अपवित्र हो जाते थे। आमतौर पर यह काम स्कूल के चपरासी द्वारा किया जाता था जिसकी अनुपस्थिति में बालक आंबेडकर को बिना पानी के ही रहना पड़ता था। अपने भाइयों और बहनों मे केवल अम्बेडकर ही स्कूल की परीक्षा में सफल हुए और इसके बाद बड़े स्कूल मे जाने में सफल हुये। अपने एक देशस्त ब्राह्मण शिक्षक महादेव अम्बेडकर जो उनसे विशेष स्नेह रखते थे के कहने पर अम्बेडकर ने अपने नाम से सकपाल हटाकर अम्बेडकर जोड़ लिया जो उनके गांव के नाम "अंबावडे" पर आधारित था। कई सामाजिक और वित्तीय बाधाएं पार कर, आंबेडकर उन कुछ पहले अछूतों मे से एक बन गये जिन्होने भारत में कॉलेज की शिक्षा प्राप्त की। आंबेडकर ने कानून की उपाधि प्राप्त करने के साथ ही विधि, अर्थशास्त्र  व राजनीतिक विज्ञान में अपने अध्ययन और अनुसंधान के कारण कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स से कई डॉक्टरेट डिग्रियां भी अर्जित कीं। आंबेडकर वापस अपने देश एक प्रसिद्ध विद्वान के रूप में लौट आए और इसके बाद कुछ साल तक उन्होंने वकालत का अभ्यास किया। इसके बाद उन्होंने कुछ पत्रिकाओं का प्रकाशन किया, जिनके द्वारा उन्होंने भारतीय अस्पृश्यों के राजनैतिक अधिकारों और सामाजिक स्वतंत्रता की वकालत की।
शिक्षा
गायकवाड शासक ने संयुक्त राज्य अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय मे जाकर अध्ययन के लिये अम्बेडकर का चयन किया गया साथ ही इसके लिये एक ११.५ डॉलर प्रति मास की छात्रवृत्ति भी प्रदान की। न्यूयॉर्क शहर में आने के बाद, अम्बेडकर को राजनीति विज्ञान विभाग के स्नातक अध्ययन कार्यक्रम में प्रवेश दे दिया गया। शयनशाला मे कुछ दिन रहने के बाद, वे भारतीय छात्रों द्वारा चलाये जा रहे एक आवास क्लब मे रहने चले गए और उन्होने अपने एक पारसी मित्र नवल भातेना के साथ एक कमरा ले लिया। १९१६ में, उन्हे उनके एक शोध के लिए पी. एच.डी. से सम्मानित किया गया। इस शोध को अंततः उन्होंने पुस्तक "इवोल्युशन ओफ प्रोविन्शिअल फिनान्स इन ब्रिटिश इंडिया" के रूप में प्रकाशित किया। हालाँकि उनकी पहला प्रकाशित काम, एक लेख जिसका शीर्षक, भारत में जाति : उनकी प्रणाली , उतपत्ति और विकास है। अपनी डाक्टरेट की डिग्री लेकर अम्बेडकर लंदन चले गये जहाँ उन्होने ग्रे'स इन और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में कानून का अध्ययन और अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट शोध की तैयारी के लिये अपना नाम लिखवा लिया। अगले वर्ष छात्रवृत्ति की समाप्ति के चलते मजबूरन उन्हें अपना अध्ययन अस्थायी तौर बीच मे ही छोड़ कर भारत वापस लौटना पडा़ ये विश्व युद्ध प्रथम का काल था।
बड़ौदा राज्य के सेना सचिव के रूप में काम करते हुये अपने जीवन मे अचानक फिर से आये भेदभाव से अम्बेडकर उदास हो गये, और अपनी नौकरी छोड़ एक निजी ट्यूटर और लेखाकार के रूप में काम करने लगे। यहाँ तक कि अपनी परामर्श व्यवसाय भी आरंभ किया जो उनकी सामाजिक स्थिति के कारण विफल रहा। अपने एक अंग्रेज जानकार बंबई के पूर्व राज्यपाल लॉर्ड सिडनेम, के कारण उन्हें बंबई के सिडनेम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनोमिक्स मे राजनीतिक अर्थव्यवस्था के प्रोफेसर के रूप में नौकरी मिल गयी। १९२० में कोल्हापुर के महाराजा अपने पारसी मित्र के सहयोग और अपनी बचत के कारण वो एक बार फिर से इंग्लैंड वापस जाने में सक्षम हो गये। १९२३ में उन्होंने अपना शोध प्रोब्लेम्स ऑफ द रुपी (रुपये की समस्यायें) पूरा कर लिया। उन्हें लंदन विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टर ऑफ साईंस की उपाधि प्रदान की गयी। और उनकी कानून का अध्ययन पूरा होने के, साथ ही साथ उन्हें ब्रिटिश बार मे बैरिस्टर के रूप में प्रवेश मिल गया। भारत वापस लौटते हुये अम्बेडकर तीन महीने जर्मनी में रुके, जहाँ उन्होने अपना अर्थशास्त्र का अध्ययन, बॉन विश्वविद्यालय में जारी रखा। उन्हे औपचारिक रूप से ८ जून १९२७ को कोलंबिया विश्वविद्यालय द्वारा पी एच.डी.प्रदान की गयी।

छुआछूत के विरुद्ध संघर्ष

भारत सरकार अधिनियम १९१९, तैयार कर रही साउथबोरोह समिति के समक्ष, भारत के एक प्रमुख विद्वान के तौर पर अम्बेडकर को गवाही देने के लिये आमंत्रित किया गया। इस सुनवाई के दौरान, अम्बेडकर ने दलितों और अन्य धार्मिक समुदायों के लिये पृथक निर्वाचिका (separate electorates) और आरक्षण देने की वकालत की। १९२० में, बंबई में, उन्होंने साप्ताहिक मूकनायक के प्रकाशन की शुरूआत की। यह प्रकाशन जल्द ही पाठकों मे लोकप्रिय हो गया, तब्, अम्बेडकर ने इसका इस्तेमाल रूढ़िवादी हिंदू राजनेताओं व जातीय भेदभाव से लड़ने के प्रति भारतीय राजनैतिक समुदाय की अनिच्छा की आलोचना करने के लिये किया। उनके दलित वर्ग के एक सम्मेलन के दौरान दिये गये भाषण ने कोल्हापुर राज्य के स्थानीय शासक शाहू चतुर्थ को बहुत प्रभावित किया, जिनका अम्बेडकर के साथ भोजन करना रूढ़िवादी समाज मे हलचल मचा गया। अम्बेडकर ने अपनी वकालत अच्छी तरह जमा ली, और बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना भी की जिसका उद्देश्य दलित वर्गों में शिक्षा का प्रसार और उनके सामाजिक आर्थिक उत्थान के लिये काम करना था। सन् १९२६ में, वो बंबई विधान परिषद के एक मनोनीत सदस्य बन गये। सन १९२७ में डॉ. अम्बेडकर ने छुआछूत के खिलाफ एक व्यापक आंदोलन शुरू करने का फैसला किया। उन्होंने सार्वजनिक आंदोलनों और जुलूसों के द्वारा, पेयजल के सार्वजनिक संसाधन समाज के सभी लोगों के लिये खुलवाने के साथ ही उन्होनें अछूतों को भी हिंदू मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार दिलाने के लिये भी संघर्ष किया। उन्होंने महड में अस्पृश्य समुदाय को भी शहर की पानी की मुख्य टंकी से पानी लेने का अधिकार दिलाने कि लिये सत्याग्रह चलाया।

पूना संधि
अब तक डॉ अम्बेडकर आज तक की सबसे बडी़ अछूत राजनीतिक हस्ती बन चुके थे। उन्होंने मुख्यधारा के महत्वपूर्ण राजनीतिक दलों की जाति व्यवस्था के उन्मूलन के प्रति उनकी कथित उदासीनता की कटु आलोचना की। अम्बेडकर ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और उसके नेता मोहनदास गांधी की आलोचना की, उन्होने उन पर अस्पृश्य समुदाय को एक करुणा की वस्तु के रूप मे प्रस्तुत करने का आरोप लगाया। अम्बेडकर ब्रिटिश शासन की विफलताओं से भी असंतुष्ट थे, उन्होने अस्पृश्य समुदाय के लिये एक ऐसी अलग राजनैतिक पहचान की वकालत की जिसमे कांग्रेस और ब्रिटिश दोनों का ही कोई दखल ना हो। 8 अगस्त,1930 को एक शोषित वर्ग के सम्मेलन के दौरान अम्बेडकर ने अपनी राजनीतिक दृष्टि को दुनिया के सामने रखा, जिसके अनुसार शोषित वर्ग की सुरक्षा उसके सरकार और कांग्रेस दोनों से स्वतंत्र होने मे है।
हमें अपना रास्ता स्वयँ बनाना होगा और स्वयँ ... राजनीतिक शक्ति शोषितो की समस्याओं का निवारण नहीं हो सकती, उनका उद्धार समाज मे उनका उचित स्थान पाने मे निहित है। उनको अपना रहने का बुरा तरीका बदलना होगा.... उनको शिक्षित होना चाहिए .... एक बड़ी आवश्यकता उनकी हीनता की भावना को झकझोरने, और उनके अंदर उस दैवीय असंतोष की स्थापना करने की है जो सभी उँचाइयों का स्रोत है।
इस भाषण में अम्बेडकर ने कांग्रेस और गांधी द्वारा चलाये गये नमक सत्याग्रह की शुरूआत की आलोचना की। अम्बेडकर की आलोचनाओं और उनके राजनीतिक काम ने उसको रूढ़िवादी हिंदुओं के साथ ही कांग्रेस के कई नेताओं मे भी बहुत अलोकप्रिय बना दिया, यह वही नेता थे जो पहले छुआछूत की निंदा करते थे और इसके उन्मूलन के लिये जिन्होने देश भर में काम किया था। इसका मुख्य कारण था कि ये "उदार" राजनेता आमतौर पर अछूतों को पूर्ण समानता देने का मुद्दा पूरी तरह नहीं उठाते थे। अम्बेडकर की अस्पृश्य समुदाय मे बढ़ती लोकप्रियता और जन समर्थन के चलते उनको 1931 मे लंदन में दूसरे गोलमेज सम्मेलन में, भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। यहाँ उनकी अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने के मुद्दे पर तीखी बहस हुई। धर्म और जाति के आधार पर पृथक निर्वाचिका देने के प्रबल विरोधी गांधी ने आशंका जताई, कि अछूतों को दी गयी पृथक निर्वाचिका, हिंदू समाज की भावी पीढी़ को हमेशा के लिये विभाजित कर देगी।
1932 मे जब ब्रिटिशों ने अम्बेडकर के साथ सहमति व्यक्त करते हुये अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने की घोषणा की,तब गांधी ने इसके विरोध मे पुणे की यरवदा सेंट्रल जेल में आमरण अनशन शुरु कर दिया। गाँधी ने रूढ़िवादी हिंदू समाज से सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता को खत्म करने तथा, हिंदुओं की राजनीतिक और सामाजिक एकता की बात की। गांधी के अनशन को देश भर की जनता से घोर समर्थन मिला और रूढ़िवादी हिंदू नेताओं, कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं जैसे पवलंकर बालू और मदन मोहन मालवीय ने अम्बेडकर और उनके समर्थकों के साथ यरवदा मे संयुक्त बैठकें कीं। अनशन के कारण गांधी की मृत्यु होने की स्थिति मे, होने वाले सामाजिक प्रतिशोध के कारण होने वाली अछूतों की हत्याओं के डर से और गाँधी जी के समर्थकों के भारी दवाब के चलते अंबेडकर ने अपनी पृथक निर्वाचिका की माँग वापस ले ली। इसके एवज मे अछूतों को सीटों के आरक्षण , मंदिरों में प्रवेश/पूजा के अधिकार एवं छूआ-छूत ख़तम करने की बात स्वीकार कर ली गयी । गाँधी ने इस उम्मीद पर की बाकि सभी स्वर्ण भी पूना संधि का आदर कर , सभी शर्ते मान लेंगे अपना अनशन समाप्त कर दिया।
आरक्षण सिस्टम में पहले दलित अपने लिए संभावित उमीदवारों में से चुनाव द्वारा (केवल दलित) चार संभावित उमीदवार चुनते । इन चार उमीदवारों में से फिर संयुक्त निर्वाचन चुनाव (सभी धर्म \ जाती) द्वारा एक विजेता चुना जाता । इस आधार पर सिर्फ एक बार सन 1937 में चुनाव हुए । आंबेडकर 20-25 साल के लिया आरक्षण चाहते थे लेकिन गाँधी के अड़े रहने के कारण आरक्षण केवल 5 साल के लागु हुआ।
पृथक निर्वाचन में दलित दो वोट देता एक जनरल कास्ट के उम्मीदवार को ओर दूसरा दलित(पृथक) उम्मीदवार को। ऐसी स्थिति में दलितों द्वारा चुना गया दलित उम्मीदवार दलितों की समस्या को अच्छी तरह से तो रख सकता था किन्तु गैर उम्मीदवार के लिए यह जरूरी नहीं था कि उनकी समस्याओं के समाधान का प्रयास भी करता। बाद मे अम्बेडकर ने गाँधी जी की आलोचना करते हुये उनके इस अनशन को अछूतों को उनके राजनीतिक अधिकारों से वंचित करने और उन्हें उनकी माँग से पीछे हटने के लिये दवाब डालने के लिये गांधी का खेला एक नाटक करार दिया। असली महात्मा तो ज्योति राव फुले थे
13 अक्टूबर 1935 को,अम्बेडकर को सरकारी लॉ कॉलेज का प्रधानचार्य नियुक्त किया गया और इस पद पर उन्होने दो वर्ष तक कार्य किया। इसके चलते अंबेडकर बंबई में बस गये, उन्होने यहाँ एक बडे़ घर का निर्माण कराया, जिसमे उनके निजी पुस्तकालय मे 50000 से अधिक पुस्तकें थीं। इसी वर्ष उनकी पत्नी रमाबाई की एक लंबी बीमारी के बाद मृत्यु हो गई। रमाबाई अपनी मृत्यु से पहले तीर्थयात्रा के लिये पंढरपुर जाना चाहती थीं पर अंबेडकर ने उन्हे इसकी इजाज़त नहीं दी। अम्बेडकर ने कहा की उस हिन्दु तीर्थ मे जहाँ उनको अछूत माना जाता है, जाने का कोई औचित्य नहीं है इसके बजाय उन्होने उनके लिये एक नया पंढरपुर बनाने की बात कही। भले ही अस्पृश्यता के खिलाफ उनकी लडा़ई को भारत भर से समर्थन हासिल हो रहा था पर उन्होने अपना रवैया और अपने विचारों को रूढ़िवादी हिंदुओं के प्रति और कठोर कर लिया। उनकी रूढ़िवादी हिंदुओं की आलोचना का उत्तर बडी़ संख्या मे हिंदू कार्यकर्ताओं द्वारा की गयी उनकी आलोचना से मिला। 13 अक्टूबर को नासिक के निकट येओला मे एक सम्मेलन में बोलते हुए अम्बेडकर ने धर्म परिवर्तन करने की अपनी इच्छा प्रकट की। उन्होने अपने अनुयायियों से भी हिंदू धर्म छोड़ कोई और धर्म अपनाने का आह्वान किया। उन्होने अपनी इस बात को भारत भर मे कई सार्वजनिक सभाओं मे दोहराया भी।
1936 में, अम्बेडकर ने स्वतंत्र लेबर पार्टी की स्थापना की, जो 1937 में केन्द्रीय विधान सभा चुनावों मे 15 सीटें जीती। उन्होंने अपनी पुस्तक जाति के विनाश भी इसी वर्ष प्रकाशित की जो उनके न्यूयॉर्क मे लिखे एक शोधपत्र पर आधारित थी। इस सफल और लोकप्रिय पुस्तक मे अम्बेडकर ने हिंदू धार्मिक नेताओं और जाति व्यवस्था की जोरदार आलोचना की। उन्होंने अस्पृश्य समुदाय के लोगों को गाँधी द्वारा रचित शब्द हरिजन पुकारने के कांग्रेस के फैसले की कडी़ निंदा की। अम्बेडकर ने रक्षा सलाहकार समिति और वाइसराय की कार्यकारी परिषद के लिए श्रम मंत्री के रूप में सेवारत रहे।
1941 और 1945 के बीच में उन्होंने बड़ी संख्या में अत्यधिक विवादास्पद पुस्तकें और पर्चे प्रकाशित किये जिनमे वॉट कॉंग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स (काँग्रेस और गान्धी ने अछूतों के लिये क्या किया) के साथ, अम्बेडकर ने गांधी और कांग्रेस दोनो पर अपने हमलों को तीखा कर दिया उन्होने उन पर ढोंग करने का आरोप लगाया। उन्होने अपनी पुस्तक ‘हू वर द शुद्राज़?’( शुद्र कौन थे?) के द्वारा हिंदू जाति व्यवस्था के पदानुक्रम में सबसे नीची जाति यानी शुद्रों के अस्तित्व मे आने की व्याख्या की. उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि किस तरह से अछूत, शुद्रों से अलग हैं। अम्बेडकर ने अपनी राजनीतिक पार्टी को अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन मे बदलते देखा, हालांकि 1946 में आयोजित भारत के संविधान सभा के लिए हुये चुनाव में इसने खराब प्रदर्शन किया। 1948 में हू वर द शुद्राज़? की उत्तरकथा द अनटचेबलस: ए थीसिस ऑन द ओरिजन ऑफ अनटचेबिलिटी (अस्पृश्य: अस्पृश्यता के मूल पर एक शोध) मे अम्बेडकर ने हिंदू धर्म को लताड़ा।
हिंदू सभ्यता .... जो मानवता को दास बनाने और उसका दमन करने की एक क्रूर युक्ति है और इसका उचित नाम बदनामी होगा। एक सभ्यता के बारे मे और क्या कहा जा सकता है जिसने लोगों के एक बहुत बड़े वर्ग को विकसित किया जिसे... एक मानव से हीन समझा गया और जिसका स्पर्श मात्र प्रदूषण फैलाने का पर्याप्त कारण है?
उन्होंने पूछा कि क्या पाकिस्तान की स्थापना के लिये पर्याप्त कारण मौजूद थे? और सुझाव दिया कि हिंदू और मुसलमानों के बीच के मतभेद एक कम कठोर कदम से भी मिटाना संभव हो सकता था। उन्होंने लिखा है कि पाकिस्तान को अपने अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करना चाहिये। कनाडा जैसे देशों मे भी सांप्रदायिक मुद्दे हमेशा से रहे हैं पर आज भी अंग्रेज और फ्रांसीसी एक साथ रहते हैं, तो क्या हिंदु और मुसलमान भी साथ नहीं रह सकते। उन्होंने चेताया कि दो देश बनाने के समाधान का वास्तविक क्रियान्वयन अत्यंत कठिनाई भरा होगा। विशाल जनसंख्या के स्थानान्तरण के साथ सीमा विवाद की समस्या भी रहेगी। भारत की स्वतंत्रता के बाद होने वाली हिंसा को ध्यान मे रख कर यह भविष्यवाणी कितनी सही थी||

अपने विवादास्पद विचारों, और गांधी और कांग्रेस की कटु आलोचना के बावजूद अम्बेडकर की प्रतिष्ठा एक अद्वितीय विद्वान और विधिवेत्ता की थी जिसके कारण जब, 15 अगस्त, 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार अस्तित्व मे आई तो उसने अम्बेडकर को देश का पहले कानून मंत्री के रूप में सेवा करने के लिए आमंत्रित किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। 29 अगस्त 1947 को, अम्बेडकर को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना कि लिए बनी के संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया। अम्बेडकर ने मसौदा तैयार करने के इस काम मे अपने सहयोगियों और समकालीन प्रेक्षकों की प्रशंसा अर्जित की। इस कार्य में अम्बेडकर का शुरुआती बौद्ध संघ रीतियों और अन्य बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन बहुत काम आया।
संघ रीति मे मतपत्र द्वारा मतदान, बहस के नियम, पूर्ववर्तिता और कार्यसूची के प्रयोग, समितियाँ और काम करने के लिए प्रस्ताव लाना शामिल है। संघ रीतियाँ स्वयं प्राचीन गणराज्यों जैसे शाक्य और लिच्छवि की शासन प्रणाली के निदर्श (मॉडल) पर आधारित थीं। अम्बेडकर ने हालांकि उनके संविधान को आकार देने के लिए पश्चिमी मॉडल इस्तेमाल किया है पर उसकी भावना भारतीय है।
अम्बेडकर द्वारा तैयार किया गया संविधान पाठ मे संवैधानिक गारंटी के साथ व्यक्तिगत नागरिकों को एक व्यापक श्रेणी की नागरिक स्वतंत्रताओं की सुरक्षा प्रदान की जिनमें, धार्मिक स्वतंत्रता, अस्पृश्यता का अंत और सभी प्रकार के भेदभावों को गैर कानूनी करार दिया गया। अम्बेडकर ने महिलाओं के लिए व्यापक आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की वकालत की, और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए सिविल सेवाओं, स्कूलों और कॉलेजों की नौकरियों मे आरक्षण प्रणाली शुरू के लिए सभा का समर्थन भी हासिल किया, भारत के विधि निर्माताओं ने इस सकारात्मक कार्यवाही के द्वारा दलित वर्गों के लिए सामाजिक और आर्थिक असमानताओं के उन्मूलन और उन्हे हर क्षेत्र मे अवसर प्रदान कराने की चेष्टा की जबकि मूल कल्पना मे पहले इस कदम को अस्थायी रूप से और आवश्यकता के आधार पर शामिल करने की बात कही गयी थी. 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा ने संविधान को अपना लिया। अपने काम को पूरा करने के बाद, बोलते हुए, अम्बेडकर ने कहा :
मैं महसूस करता हूं कि संविधान, साध्य (काम करने लायक) है, यह लचीला है पर साथ ही यह इतना मज़बूत भी है कि देश को शांति और युद्ध दोनों के समय जोड़ कर रख सके। वास्तव में, मैं कह सकता हूँ कि अगर कभी कुछ गलत हुआ तो इसका कारण यह नही होगा कि हमारा संविधान खराब था बल्कि इसका उपयोग करने वाला मनुष्य अधम था।
1951 मे संसद में अपने हिन्दू कोड बिल के मसौदे को रोके जाने के बाद अम्बेडकर ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया इस मसौदे मे उत्तराधिकार, विवाह और अर्थव्यवस्था के कानूनों में लैंगिक समानता की मांग की गयी थी। पर संसद सदस्यों की एक बड़ी संख्या इसके खिलाफ़ थी। अम्बेडकर ने 1952 में लोक सभा का चुनाव एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप मे लड़ा पर हार गये। मार्च 1952 मे उन्हें संसद के ऊपरी सदन यानि राज्य सभा के लिए नियुक्त किया गया और इसके बाद उनकी मृत्यु तक वो इस सदन के सदस्य रहे।
बौद्ध धर्म मे परिवर्तन
सन् 1950 के दशक में अम्बेडकर बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित हुए और बौद्ध भिक्षुओं व विद्वानों के एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए श्रीलंका(तब सीलोन) गये। पुणे के पास एक नया बौद्ध विहार को समर्पित करते हुए, अम्बेडकर ने घोषणा की कि वे बौद्ध धर्म पर एक पुस्तक लिख रहे हैं, और जैसे ही यह समाप्त होगी वो औपचारिक रूप से बौद्ध धर्म अपना लेंगे। 1954 में अम्बेडकर ने बर्मा का दो बार दौरा किया; दूसरी बार वो रंगून मे तीसरे विश्व बौद्ध फैलोशिप के सम्मेलन में भाग लेने के लिए गये। 1955 में उन्होने भारतीय बुद्ध महासभा या बौद्ध सोसाइटी ऑफ इंडिया की स्थापना की। उन्होंने अपने अंतिम लेख, द बुद्ध एंड हिज़ धम्म को 1956 में पूरा किया। यह उनकी मृत्यु के पश्चात प्रकाशित हुआ। 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में अम्बेडकर ने खुद और उनके समर्थकों के लिए एक औपचारिक सार्वजनिक समारोह का आयोजन किया. अम्बेडकर ने एक बौद्ध भिक्षु से पारंपरिक तरीके से तीन रत्न ग्रहण और पंचशील को अपनाते हुये बौद्ध धर्म ग्रहण किया। इसके बाद उन्होने एक अनुमान के अनुसार लगभग 500000 समर्थको को बौद्ध धर्म मे परिवर्तित किया। नवयान लेकर अम्बेडकर और उनके समर्थकों ने हिंदू धर्म और हिंदू दर्शन की स्पष्ट निंदा की और उसे त्याग दिया। इसके बाद वे नेपाल में चौथे विश्व बौद्ध सम्मेलन मे भाग लेने के लिए काठमांडू गये। उन्होंने अपनी अंतिम पांडुलिपि बुद्ध या कार्ल मार्क्स को 2 दिसंबर 1956 को पूरा किया।

डा बी.आर. अम्बेडकर ने दीक्षा भूमि, नागपुर, भारत में ऐतिहासिक बौद्ध धर्मं में परिवर्तन के अवसर पर,15 अक्टूबर 1956 को अपने अनुयायियों के लिए 22 प्रतिज्ञाएँ निर्धारित कीं.800000 लोगों का बौद्ध धर्म में रूपांतरण ऐतिहासिक था क्योंकि यह विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक रूपांतरण था.उन्होंने इन शपथों को निर्धारित किया ताकि हिंदू धर्म के बंधनों को पूरी तरह पृथक किया जा सके.ये 22 प्रतिज्ञाएँ हिंदू मान्यताओं और पद्धतियों की जड़ों पर गहरा आघात करती हैं. ये एक सेतु के रूप में बौद्ध धर्मं की हिन्दू धर्म में व्याप्त भ्रम और विरोधाभासों से रक्षा करने में सहायक हो सकती हैं.इन प्रतिज्ञाओं से हिन्दू धर्म,जिसमें केवल हिंदुओं की ऊंची जातियों के संवर्धन के लिए मार्ग प्रशस्त किया गया, में व्याप्त अंधविश्वासों, व्यर्थ और अर्थहीन रस्मों, से धर्मान्तरित होते समय स्वतंत्र रहा जा सकता है. प्रसिद्ध 22 प्रतिज्ञाएँ निम्न हैं:

1. मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कोई विश्वास नहीं करूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा
2. मैं राम और कृष्ण, जो भगवान के अवतार माने जाते हैं, में कोई आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा
3. मैं गौरी, गणपति और हिन्दुओं के अन्य देवी-देवताओं में आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा.
4. मैं भगवान के अवतार में विश्वास नहीं करता हूँ
5. मैं यह नहीं मानता और न कभी मानूंगा कि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार थे. मैं इसे पागलपन और झूठा प्रचार-प्रसार मानता हूँ
6. मैं श्रद्धा (श्राद्ध) में भाग नहीं लूँगा और न ही पिंड-दान दूँगा.
7. मैं बुद्ध के सिद्धांतों और उपदेशों का उल्लंघन करने वाले तरीके से कार्य नहीं करूँगा
8. मैं ब्राह्मणों द्वारा निष्पादित होने वाले किसी भी समारोह को स्वीकार नहीं करूँगा
9. मैं मनुष्य की समानता में विश्वास करता हूँ
10. मैं समानता स्थापित करने का प्रयास करूँगा
11. मैं बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग का अनुशरण करूँगा
12. मैं बुद्ध द्वारा निर्धारित परमितों का पालन करूँगा.
13. मैं सभी जीवित प्राणियों के प्रति दया और प्यार भरी दयालुता रखूँगा तथा उनकी रक्षा करूँगा.
14. मैं चोरी नहीं करूँगा.
15. मैं झूठ नहीं बोलूँगा
16. मैं कामुक पापों को नहीं करूँगा.
17. मैं शराब, ड्रग्स जैसे मादक पदार्थों का सेवन नहीं करूँगा.
18. मैं महान आष्टांगिक मार्ग के पालन का प्रयास करूँगा एवं सहानुभूति और प्यार भरी दयालुता का दैनिक जीवन में अभ्यास करूँगा.
19. मैं हिंदू धर्म का त्याग करता हूँ जो मानवता के लिए हानिकारक है और उन्नति और मानवता के विकास में बाधक है क्योंकि यह असमानता पर आधारित है, और स्व-धर्मं के रूप में बौद्ध धर्म को अपनाता हूँ
20. मैं दृढ़ता के साथ यह विश्वास करता हूँ की बुद्ध का धम्म ही सच्चा धर्म है.
21. मुझे विश्वास है कि मैं फिर से जन्म ले रहा हूँ (इस धर्म परिवर्तन के द्वारा).
22. मैं गंभीरता एवं दृढ़ता के साथ घोषित करता हूँ कि मैं इसके (धर्म परिवर्तन के) बाद अपने जीवन का बुद्ध के सिद्धांतों व शिक्षाओं एवं उनके धम्म के अनुसार मार्गदर्शन करूँगा.

1948 से, अम्बेडकर मधुमेह से पीड़ित थे। जून से अक्टूबर 1954 तक वो बहुत बीमार रहे इस दौरान वो नैदानिक अवसाद और कमजोर होती दृष्टि से ग्रस्त थे। राजनीतिक मुद्दों से परेशान अम्बेडकर का स्वास्थ्य बद से बदतर होता चला गया और 1955 के दौरान किये गये लगातार काम ने उन्हें तोड़ कर रख दिया। अपनी अंतिम पांडुलिपि बुद्ध और उनके धम्म को पूरा करने के तीन दिन के बाद 6 दिसंबर 1956 को अम्बेडकर की मृत्यु नींद में दिल्ली में उनके घर मे हो गई। 7 दिसंबर को चौपाटी समुद्र तट पर बौद्ध शैली मे अंतिम संस्कार किया गया जिसमें सैकड़ों हजारों समर्थकों, कार्यकर्ताओं और प्रशंसकों ने भाग लिया।
मृत्युपरांत अम्बेडकर के परिवार मे उनकी दूसरी पत्नी सविता अम्बेडकर रह गयी थीं जो, जन्म से ब्राह्मण थीं पर उनके साथ ही वो भी धर्म परिवर्तित कर बौद्ध बन गयी थीं। विवाह से पहले उनकी पत्नी का नाम शारदा कबीर था। सविता अम्बेडकर की एक बौद्ध के रूप में सन 2002 में मृत्यु हो गई, अम्बेडकर के पौत्र, प्रकाश यश्वंत अम्बेडकर, भारिपा बहुजन महासंघ का नेतृत्व करते है और भारतीय संसद के दोनों सदनों मे के सदस्य रह चुके है।
एक स्मारक अम्बेडकर के दिल्ली स्थित उनके घर 26 अलीपुर रोड में स्थापित किया गया है। अम्बेडकर जयंती पर सार्वजनिक अवकाश रखा जाता है। 1990 में उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया है। कई सार्वजनिक संस्थान का नाम उनके सम्मान में उनके नाम पर रखा गया है जैसे हैदराबाद, आंध्र प्रदेश का डॉ. अम्बेडकर मुक्त विश्वविद्यालय, बी आर अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय- मुजफ्फरपुर , डॉ. बाबासाहेब् अम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा नागपुर में है, जो पहले सोनेगांव हवाई अड्डे के नाम से जाना जाता था। अम्बेडकर का एक बड़ा आधिकारिक चित्र भारतीय संसद भवन में प्रदर्शित किया गया है।
मुंबई मे उनके स्मारक हर साल लगभग पाँच लाख लोग उनकी वर्षगांठ (14 अप्रैल) पुण्यतिथि (6 दिसम्बर) और धम्म चक्र परिवर्तन् दिन 14 अक्टूबर नागपुर में, उन्हे अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए इकट्ठे होते हैं।अपने अनुयायियों को उनका संदेश था " शिक्षित बनो !!!, संगठित रहो!!!, संघर्ष करो !!!".
ग्रामीण जीवन पर अम्बेडकर बनाम गांधी
अम्बेडकर, महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उग्र आलोचक थे. उनके समकालीनों और आधुनिक विद्वानों ने उनके महात्मा गांधी (जो कि पहले भारतीय नेता थे जिन्होने अस्पृश्यता और भेदभाव करने का मुद्दा सबसे पहले उठाया था) के विरोध की आलोचना है।
गांधी का दर्शन भारत के पारंपरिक ग्रामीण जीवन के प्रति अधिक सकारात्मक, लेकिन रूमानी था, और उनका दृष्टिकोण अस्पृश्यों के प्रति भावनात्मक था उन्होने उन्हें हरिजन कह कर पुकारा। अम्बेडकर ने इस विशेषण को सिरे से अस्वीकार कर दिया। उन्होंने अपने अनुयायियों को गांव छोड़ कर शहर जाकर बसने और शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया।

आलोचना और विरासत
अम्बेडकर की सामाजिक और राजनैतिक सुधारक की विरासत का आधुनिक भारत पर गहरा प्रभाव पड़ा है। स्वतंत्रता के बाद के भारत मे उनकी सामाजिक और राजनीतिक सोच को सारे राजनीतिक हलके का सम्मान हासिल हुआ। उनकी इस पहल ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों मे आज के भारत की सोच को प्रभावित किया। उनकी यह् सोच आज की सामाजिक, आर्थिक नीतियों, शिक्षा, कानून और सकारात्मक कार्रवाई के माध्यम से प्रदर्शित होती है। एक विद्वान के रूप में उनकी ख्याति उनकी नियुक्ति स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री और संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष के रूप में कराने मे सहायक सिद्ध हुयी। उन्हें व्यक्ति की स्वतंत्रता में अटूट विश्वास था और उन्होने समान रूप से रूढ़िवादी और जातिवादी हिंदू समाज और इस्लाम की संकीर्ण और कट्टर नीतियों की आलोचना की है। उसकी हिंदू और इस्लाम की निंदा ने उसको विवादास्पद और अलोकप्रिय बनाया है, हालांकि उनके बौद्ध धर्म मे परिवर्तित होने के बाद भारत में बौद्ध दर्शन में लोगों की रुचि बढ़ी है।
अम्बेडकर के राजनीतिक दर्शन के कारण बड़ी संख्या में दलित राजनीतिक दल, प्रकाशन और कार्यकर्ता संघ अस्तित्व मे आये है जो पूरे भारत में सक्रिय रहते हैं, विशेष रूप से महाराष्ट्र में। उनके दलित बौद्ध आंदोलन को बढ़ावा देने से बौद्ध दर्शन भारत के कई भागों में पुनर्जागरित हुआ है। दलित कार्यकर्ता समय समय पर सामूहिक धर्म परिवर्तन के समारोह आयोजित उसी तरह करते रहते हैं जिस तरह अम्बेडकर ने 1956 मे नागपुर मे आयोजित किया था।
कुछ विद्वानों, जिनमें से कुछ प्रभावित जातियों से है का विचार है कि अंग्रेज अधिकतर जातियों को एक नज़र से देखते थे और अगर उनका राज जारी रहता तो समाज से काफी बुराईयों को समाप्त किया जा सकता था। यह राय ज्योतिबा फुले समेत कई थी सामाजिक कार्यकर्ताओं ने रखी है।
नारायण राव काजरोलकर ने अम्बेडकर की आलोचना की है क्योंकि उन्हें विश्वास था कि वे खर्च बजाय सब लोगों के बीच, सिर्फ अपनी ही जाति यानि महार पर खर्च करने मे करते थे। सीताराम नारायण शिवतारकर भी इससे सहमत है।
आधुनिक भारत में कुछ लोग, अम्बेडकर के द्वारा शुरू किए गए आरक्षण को अप्रासांगिक और प्रतिभा विरोधी मानते हैं।

अम्बेडकर के बाद
पिछले वर्षों में लगातार बौद्ध समूहों और रूढ़िवादी हिंदुओं के बीच हिंसक संघर्ष हुये है. 1994 में मुंबई में जब किसी ने अम्बेडकर की प्रतिमा के गले में जूते की माला लटका कर उनका अपमान किया था तो चारों ओर एक सांप्रदायिक हिंसा फैल गयी थी, और हड़ताल के कारण शहर एक सप्ताह से अधिक तक बुरी तरह प्रभावित हुआ था। जब अगले वर्ष इसी तरह की गड़बड़ी हुई तो एक अम्बेडकर प्रतिमा को तोड़ा गया। तमिलनाडु में ऊंची जाति के समूह भी बौद्धों के खिलाफ हिंसा में लगे हुए हैं। इसके अलावा, कुछ परिवर्तित बौद्धों ने हिंदुओं के खिलाफ मोर्चा खोल दिया (2006, महाराष्ट्र में दलितों द्वारा विरोध) और हिंदू मंदिरों मे गन्दगी फैला दी, और देवताओं के स्थान पर अम्बेडकर के चित्र लगा दिये। एक कट्टरपंथी अम्बेडकरवादी संस्था बौद्ध पैंथर्स मूवमेंट ने तो अम्बेडकर के बौद्ध धर्म के आलोचकों की हत्या तक करने का प्रयास किया है।
डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर

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